बेटे के उठावने में ही लिख दिया था बाइक चलाएं तो हेलमेट जरूर पहनें
‘चक दे इंडिया’ के बाद एक और मिशन पर मीर रंजन नेगी। इंदौर से नाता रखने वाले नेगी इस बार हॉकी नहीं, हेलमेट के मिशन पर हैं। सड़क हादसे में बेटे की मौत ने झकझोर दिया। बीड़ा उठाया किसी और के साथ ऐसा ना हो। हेलमेट को लेकर एक मुहिम शुरू कर दी। अब तक एक लाख लोगों से रूबरू हो चुके हैं। सबसे एक ही बात ‘जान से ज्यादा कीमती कुछ नहीं। गाड़ी चलाएं तो हेलमेट जरूर लगाए।’ भोपाल ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें हेलमेट और रोड सेफ्टी मुहिम में भागीदार बनने का न्योता दिया है। इसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है।
पूर्व ओलिंपियन मीर रंजन के बेटे अभिरंजन की बाइक 21 अक्टूबर 2005 को डिवाइडर से टकरा गई थी। उन्होंने हेलमेट नहीं पहना था। यह उनकी आखिरी ड्राइव थी। 10 साल से नेगी की एक ही जिद है- सड़क हादसों में मरने वालों का ग्राफ कम होना ही चाहिए। उन्होंने अभिरंजन के उठावने के कार्ड में ही लिखवा दिया था- ‘बाइक चलाएं तो हेलमेट जरूर पहनें।’ वह एक शुरुआत थी। तब से अब तक महाराष्ट्र के 20 शहरों में वे इस विषय को लेकर गए हैं। रोड सेफ्टी पर 2010 से ही उन्हाेंने काम शुरू किया। कई कार्यक्रम किए। ‘पहला कदम’ नामक शॉर्ट फिल्म बनाई। फिल्म की थीम रोड सेफ्टी से जुड़ी थी, जिसे कई अवाॅर्ड मिले। यह एक पिता का दर्द था, जिसने सड़क हादसे में जवान बेटे को खोया था। उन्होंने ग्लूम एंड ग्लोरी के नाम से एक नाटक तैयार किया। इसकी प्रस्तावना शाहरुख खान ने लिखी है। करीब 45 मिनट के इस प्ले के आखिरी 10 मिनट जिंदगी की अहमियत बताते हुए रोड सेफ्टी और हेलमेट लगाने पर केंद्रित हैं। देश में 70 जगह यह नाटक खेला गया। यह मुहिम नेगी की पहचान बन गई।
महाराष्ट्र के बाद मध्यप्रदेश की बारी
जल्दी ही उनका अगला पड़ाव भोपाल होगा। एएसपी ट्रैफिक समीर यादव कहते हैं- ट्रैफिक सुरक्षा पर उनसे बेहतर कौन बता सकता है। भास्कर से चर्चा में नेगी कहते हैं कि इंदौर से मेरा पुराना नाता रहा है। इसलिए मध्यप्रदेश में इस अभियान से जुड़ना मेरा फर्ज है। अगर हम आज के जोशीले युवाओं को समझा पाने में सफल होते हैं तो यह किसी भी बड़े पुरस्कार से बड़ी बात होगी।
शहर के पेट्रोल पंपों और कॉलेजों में हेलमेट अनिवार्य किया गया है। पेट्रोल पंपों पर ऐसा पहले भी किया गया मगर कॉलेज पहली बार आगे आए।
उस हादसे के करीब पांच महीने बाद नेगी ने यशराज फिल्म्स की सुपर हिट मूवी चक दे इंडिया के लिए काम शुरू किया। जिंदगी तो अपने रास्ते पर आ गई मगर अभिरंजन एक अफसोस बनकर उनके जेहन में छाया रहा। यह मिशन उस घुटन से मुक्त होने की एक कोशिश है। वे कहते हैं- मैं भोपाल आकर कहना चाहूंगा कि स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले हरेक नौजवान को हर पल अपने माता-पिता का चेहरा याद रखना चाहिए। उन पर उनकी सारी उम्मीदें और सपने टिके हैं। जरा सी चूक उन ख्वाबों को हमेशा के लिए चकनाचूर कर देती है। इसलिए बाइक चलाएं तो हेलमेट जरूर पहनें।
10 साल से हेलमेट के मिशन में जुटे मीर रंजन नेगी की कहानी