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आखिर वैज्ञानिकों ने सुन ही लिया ब्रह्मांड का संगीत

5 वर्ष पहले
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आसमान को देखने का अंदाज बदलने वाला है। वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड का संगीत सुन लिया है। वह संगीत, जिसकी कल्पना 1916 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने की थी। हालांकि उनका यह दावा झूठा हो गया कि इसे वैज्ञानिक कभी सुन नहीं पाएंगे।

यह ब्रह्मांड का संगीत है, गुरुत्वाकर्षण बल की तरंगें। एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने इन्हें सुनने का दावा किया है। करीब 1.3 लाख करोड़ साल पहले दो ब्लैक होल्स टकराए थे। इससे जो तरंगें पैदा हुईं, वह पृथ्वी पर 14 सितंबर 2015 को आईं। इसे 1.1 बिलियन डॉलर (75 अरब रुपए) से बने दो अंडरग्राउंड डिटेक्टर की मदद से पकड़ा गया। इसे अति-संवेदी लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जरवेटरी या लिगो नाम दिया गया है। महीनों के परीक्षण के बाद इसकी पुष्टि हुई।

कुछ वैज्ञानिक इस खोज को 2012 की “हिग्स बोसॉन’ यानी गॉड पार्टिकल की खोज के बराबर बता रहे हैं। कुछ उससे बढ़कर। इस प्रोजेक्ट को अमेरिकी नेशनल साइंस फाउंडेशन के डायरेक्टर फ्रांस कोर्डोवा ने वित्तीय मदद दी है। उन्होंने कहा, ‘हमारी खोज ब्रह्मांड के कई रहस्यों को सामने लाएगी। अनपेक्षित खोज की ओर लेकर जाएगी।’

मूक फिल्म के बोल पड़ने जैसा अनुभव है
लिगो टीम के लीडर और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के डेविड शूमाकर ने कहा, ‘यह तरंग वैसी है, जैसी आइंस्टीन ने कल्पना की थी। इसकी तीव्रता 20-30 हर्ट्ज की है। बास गिटार का सबसे कमजोर नोट। एक सेकंड के छोटे से हिस्से में 150 हर्ट्ज या उससे भी ज्यादा तीव्रता पर जाने वाली आवाज। पियानो की मिडिल सी के बराबर।’ वहीं टीम के एक अन्य सदस्य शेबोल्क मार्का ने कहा, ‘हमारे लिए आसमान को देखने का नजरिया बदल गया है। यह मूक फिल्म में बोल पड़ने जैसा अनुभव है।’

खोज में इंदौर, पुणे और गांधीनगर के वैज्ञानिकों का भी योगदान

परियोजना में भारतीय वैज्ञानिकों ने डाटा विश्लेषण सहित काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजारमन सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलाॅजी इंदौर, इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे सहित कई संस्थान इस परियोजना से जुड़े थे।

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