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फौजदारी मामलों में नोटिस से पहले तथ्य जांचें : सुप्रीम कोर्ट

5 वर्ष पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निचली अदालतों को आदेश दिया है कि फौजदारी मामलों में नोटिस जारी करने से पहले और चालान होते वक्त यह ध्यान रखा जाए कि जिसे आरोपी बनाया जा रहा है उसके खिलाफ पुख्ता तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं या नहीं। देखने में आ रहा है कि फौजदारी मामलों को तंग करने का हथियार बनाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस एएम सप्रे की बेंच ने यह आदेश जारी किया है। दरअसल, मामला पुणे जिला प्रशासन के एसडीओ संजय सिंह से जुड़ा हुआ है। प्रशासनिक कार्यालय में दत्तात्रय गुलाब राव नामक व्यक्ति ने पेट्रोल पंप खोलने के लिए एनओसी देने का आवेदन किया था। शेष|पेज 6 पर









दफ्तर के एक क्लर्क ने आवेदक से 75 हजार रुपए इस बात के लिए मांग लिए कि एसडीओ को उक्त पैसा पहुंचाना है। उसके बिना वे एनओसी पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। आवेदक ने लोकायुक्त पुलिस में इसके खिलाफ शिकायत दर्ज की। क्लर्क के साथ-साथ एसडीओ को भी आरोपी बनाया गया, जबकि एसडीओ रिश्वत मांगने के वक्त छुट्टी पर था। ट्रायल कोर्ट में जब चालान पेश किया गया तो कोर्ट ने एसडीओ को आरोपी बनाने से इनकार कर दिया। लोकायुक्त पुलिस ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। हाई कोर्ट ने एसडीओ को आरोपी बनाने का फैसला दिया। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा- हाई कोर्ट कोई जांच एजेंसी नहीं है। जब राज्य सरकार और विभाग ने जांच के बाद अफसर को क्लीन चिट दी है तो हाई कोर्ट इस तरह आरोपी बनाने का आदेश नहीं दे सकती।

मारपीट, रिश्वत, भ्रष्टाचार की शिकायतों में मिलेगी राहत

अधिवक्ता आनंद अग्रवाल का कहना है मारपीट, रिश्वत, भ्रष्टाचार की शिकायत समेत फौजदारी से जुड़े मामलों में इस फैसले से बड़ी राहत मिलेगी। पर्याप्त साक्ष्य के बगैर भी पार्टी बना लिया जाता है।

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