दूसरों की सेवा करने से सफल होता है जीवन
जीवन वही जो दूसरों के काम आए। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन नाम उन्हीं का याद रहता है जो दूसरे के भी काम आएं। दुर्लभ मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। दरिद्र नारायण की आंखों के आंसू पोंछने से बड़ा कोई पुण्य नहीं हो सकता। मनुष्य जीवन की धन्यता अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने में है। धर्म और संस्कृति के बिना कोई मनुष्य, समाज या राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता। ये विचार जगद्गुरु स्वामी रामनरेशाचार्य ने शनिवार को नवरतनबाग स्थित श्रीनिवासम पर अपने प्राकट्योत्सव के उपलक्ष्य में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा- धर्म के चार प्रमुख अंग हैं- सत्य, तप, दया और यज्ञ। विडंबना यह है कि हम यह नहीं जानते कि सुख क्यों चाहिए। भौतिक संसाधनों से सुख नहीं मिलता। सच्चा सुख तो उन कर्मों से ही मिलेगा जो धर्मजन्य होते हैं। हमारे जीवन की सांसें गिनती की ही हैं, इसलिए कोई भी सांस व्यर्थ न जाए और जब तक जिंदा रहें, दूसरों की सेवा करते रहें- यही हम सबके जीवन का प्रथम शुभ संकल्प होना चाहिए।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य आध्यात्मिक सत्संग मंडल एवं मालवांचल के भक्तों द्वारा आयोजित सप्त चिरंजीवी पूजन के बाद मंडल के सदस्यों ने महाराज का पादुका पूजन किया। गीता बिंदल, डॉ. उर्मिला तिवारी, स्नेहा जोशी, अर्पिता बिंदल, प्रेमलता जादौन ने अगवानी की। पं. गोपाल मिश्रा ने भजनों की प्रस्तुति दी। महाराज ने गीता भवन एवं नौलखा स्थित मनकामेश्वर कांटाफोड़ मंदिर व एबी रोड स्थित बालाजी मंदिर पहुंचकर देव आराधना कर मिठाई, फलाहार एवं वस्त्र दान किए। 14 फरवरी को सुबह 9 से 11 बजे तक श्रीनिवासम पर आशीर्वचन देंगे।