विग लगा लेता तो सारांश अधूरा रह जाता
सिटी रिपोर्टर कहते हैं कुछ लोगों में तिलिस्म जैसा कुछ होता है। उनकी बातें मुग्ध कर देती हैं। कुछ आवाज़ें मन में गूंजती ही रहती हैं। कुछ अहसास पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं होते। अनुपम खेर। वही तिलिस्म, वही आवाज़, वही अहसास हैं। अपने नाम के जैसे ही हैं... अनुपम। अनुपम इसलिए क्योंकि हिमाचल के एक साधारण परिवार का लड़का जिसके पिता फॉरेस्ट ऑफिस में क्लर्क थे और अभिनय से खानदान में किसी का कोई राबता नहीं था वह आज सिनेमा जगत का ध्रुव है। साथ ही वे अनुपम इसलिए भी हैं क्योंकि सारांश से लेकर आज तक उन्होंने फिल्मों की गिनती को सफलता नहीं माना। वे कहते हैं निरंतर सीखते रहने की भूख अगर आपने बुझने नहीं दी तो आप सफल हैं।
आज अनुपम और नीना गुप्ता शहर में नाटक \\\"मेरा वो मतलब नहीं था\\\' का मंचन करने वाले हैं। वे शनिवार शाम ही इंदौर पहुंच गए। पद्म भूषण से सम्मानित होने के बाद पहली बार वे इंदौर आए। सिटी भास्कर ने उनसे बातचीत की। उन्हीं की किस्सागोई में जानिए अनुपम को-
\\\"हम आपके हैं कौन\\\' के दौरान फेशियल पैरालिसिस हो गया था
संघर्ष सिर्फ पहचान बनाना और बनाए रखने के लिए ही नहीं होता। एक्टर्स के भी आम लोगों जैसे संघर्ष होते हैं। लुक्स को लेकर इनसिक्योरिटी़ज होती हैं। जैसे फिल्म हम आपके हैं कौन की शूटिंग के दौरान मुझे फेशियल पैरालिसिस हो गया था। वह सीन में जिसमें हम म्यूज़िकल गेम खेलते हैं उसमें मेरा मुंह पूरे समय टेढ़ा है। वह उस समय का संघर्ष था और आज कुछ और तरह के स्ट्रगल्स हैं। ये तो सतत हैं, बने ही रहेंगे।
मेकअपमैन विग लगा रहा था मुझे, मैंने इनकार कर दिया
मैंने स्टार्स को लेकर जो शो किया उसमें मैंने कई सितारों के जीवन के अनछुए पहलू जाने और उन्हें लोगों के सामने लाया। मैंने यह देखा कि जो लोग सफल होते हैं, बड़े निडर होते हैं। अगर आप खुद ही अपनी कमियां दुनिया को बता देंगे तो फिर किस बात का डर। सारांश के दौरान मेकअप आर्टिस्ट ने मुझे कहा था विग पहन लो। बाल गिरना मेरे लिए छोटी बात नहीं थी। मैं यंग था और अभिनय में जीवन तलाश रहा था। मैंने इस तरह खुद को समझाया कि गंजे होने की वजह से मुझे सारांश मिली है। यह मेरी कमज़ोरी नहीं ताक़त है। यह मुश्किल तो है लेकिन कारगर है।
जो प्रतिबद्ध हैं वे लथपथ ही रहते हैं, इसका अफ़सोस न करें
रंगकर्म का आर्थिक पक्ष कमज़ोर है यह बात मैं बरसों से सुनता आ रहा हूं। इसमें कुछ बदलाव आ भी रहे हैं। हालांकि जो आ रहे हैं वे नाकाफी हैं। जो प्रतिबद्ध हैं वे हमेशा ही लथपथ रहते हैं। और मैं तो कहता हूं कि अक्सर अभावों में ही प्रतिभा का विकास होता है। लाख अभावों में रहा हो रंगकर्म, करनेवाले कर ही रहे हैं। रंगकर्म एक्टर का रियाज़ है। जब फिल्में नहीं होती तो हम यह करते हैं। खुद को और काबिल बनाते हैं।
अलग-अलग कार्यक्रमों में शामिल होने अनुपम खेर और उनके बेटे सिकंदर खेर इंदौर आए, एक्टर और निर्देशक राकेश बेदी भी साथ थे