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यहां श्रीकृष्ण ने सीखी थी 64 कलाएं, गुरूदक्षिणा में किया था मरे बेटे को जिंदा

Dainik Bhaskar

Aug 23, 2016, 10:40 PM IST

श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव 25 अगस्त को मनाया जा रहा है।जन्माष्टमी के अवसर पर dainikbhaskar.com उज्जैन के सांदीपनी आश्रम के बारे में जहां की थी भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण।

महर्षि सांदीपनि आश्रम जिसमें सुदामा, श्रीकृष्ण और बलराम की प्रतिमाएं हैं। महर्षि सांदीपनि आश्रम जिसमें सुदामा, श्रीकृष्ण और बलराम की प्रतिमाएं हैं।
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इंदौर. श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव 25 अगस्त को मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी के अवसर पर dainikbhaskar.com उज्जैन के सांदीपनी आश्रम के बारे में जहां की थी भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण। यहीं श्रीकृष्ण ने 64 दिनों में 64 कलाएं सीखी थी। क्या है प्रचलित मान्यता...
चौंसठ दिन में चौंसठ कलाएं सीखीं
-ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने के पश्चात मथुरा का राज्य अपने नाना उग्रसेन को सौंप दिया था।
-इसके उपरांत वसुदेव और देवकी ने कृष्ण को यज्ञोपवीत संस्कार और शिक्षा के लिए उज्जैन में संदीपनी ऋषि के आश्रम में भेज दिया।
-यहां ही कृष्ण ने चौंसठ दिन में चौंसठ कलाएं सीखीं तथा वेद-पुराण का अध्ययन किया।
-आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा की भेंट हुई, जो बाद में अटूट मित्रता बन गई। तीनों ने अन्य सहपाठियों के साथ अपनी पूरी शिक्षा यहीं पर पूरी की।
गुरु दक्षिणा देने की बात कही
-शिक्षा के उपरांत कृष्ण ने गुरुमाता को गुरु दक्षिणा देने की बात कही।
-इस पर गुरुमाता ने कृष्ण को अद्वितीय मान कर गुरु दक्षिणा में उनका पुत्र वापस मांगा। जिसकी मृत्यु प्रभास क्षेत्र में जल में डूबकर हो गई थी।
-गुरुमाता की आज्ञा का पालन करते हुए कृष्ण ने समुद्र में मौजूद शंखासुर नामक एक राक्षस का पेट चीरकर एक शंख निकाला, जिसे “पांचजन्य” कहा जाता था।
-इसके बाद वे यमराज के पास गए और सांदीपनी ऋषि का पुत्र वापस लाकर गुरुमाता को सौंप दिया।
पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती
-तक्षशिला तथा नालंदा की तरह उज्जैन भी द्वापर युग में ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
-कहा जाता है कि यहां के गुरु संदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम ने शिक्षा प्राप्त की थी।
-आश्रम के पास एक पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती लिखी है ओर ऐसा माना जाता है कि यह गिनती गुरु संदीपनी द्वारा लिखी गई थी। ।
-श्रीमद् भागवत, महाभारत तथा अन्य कई पुराणों में इस जगह के बारे में बताया गया है।
कृष्ण, बलराम एवं सुदामा की मूर्तियां स्थापित
-महर्षि संदीपनी आश्रम शिप्रा नदी के गंगा घाट पर स्थित है। महाकालेश्वर मंदिर से इसकी दूरी सात किलोमीटर है।
-इस स्थान पर एक कुंड भी है जिसे गोमती कुंड कहा जाता है।
-इस कुंड में भगवान श्री कृष्ण ने गुरू संदीपनी स्नान के लिए गोमती नदी का जल उपलब्ध कराया था। इसलिए यह कुंड गोमती कुंड कहलाया।
-यहां पर गुरु संदीपनी कृष्ण, बलराम एवं सुदामा की मूर्तियां स्थापित हैं।
मंदिर में 6000 वर्ष पुराना शिवलिंग
-आश्रम परिसर में स्थित श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर में 6000 वर्ष पुराना शिवलिंग स्थापित है ।
-ऐसा माना जाता है कि इसे महर्षि ने बिल्व पत्र से उत्पन्न किया था।
-इस शिवलिंग की जलाधारी में पत्थर के शेषनाग के दर्शन होते हैं जो प्रायः पुरे भारत वर्ष में दुर्लभ है।
-अधिकांश मंदिरों में नंदी की मूर्ति बैठी हुई अवस्था में ही होती है। इस शिवलिंग के सामने, मंदिर के बाहर खड़े हुए नंदी की एक छोटी सी दुर्लभ मूर्ति है।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें, कौन सी 64 कलाओं के ज्ञाता थे श्रीकृष्ण....

श्रीकृष्ण के पदचिन्ह। श्रीकृष्ण के पदचिन्ह।
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श्रीकृष्ण गुरु के बेटे को यमराज के पास से लाते ह़ुए। श्रीकृष्ण गुरु के बेटे को यमराज के पास से लाते ह़ुए।
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ये हैं चौंसठ कलाएं 
1. गीत कला
2. वाद्य कला
3. नृत्य कला
4. आलेख्य कला
5. विशेषकच्छेद्य कला (मस्तक पर तिलक लगाने के लिये कागज, पत्ती आदि काटकर आकार या सांचे बनाना)
6. तण्डुल-कुसुमबलिविकार कला (देव-पूजनादि के अवसर पर तरह-तरह के रंगे हुए चावल, जौ आदि वस्तुओं तथा रंग-बिरंगे फूलों को विविध प्रकार से सजाना)
7. पुष्पास्तरण कला
8. दशनवसनांगराग कला (दांत, वस्त्र तथा शरीर के अवयवों को रंगना)
9. मणिभूमिका-कर्म कला (घर के फर्श के कुछ भागों को मोती, मणि आदि रत्नों से जड़ना)
10. शयनरचन कला (पलंग लगाना)
11. उदकवाद्य कला (जलतरंग)
12. उदकाघात कला (दूसरों पर हाथों या पिचकारी से जल की चोट मारना)
13. चित्राश्च योगा कला (जड़ी-बूटियों के योग से ऐसी विविध वस्तुएं तैयार करना या ऐसी औषधियां तैयार करना अथवा ऐसे मन्त्रों का प्रयोग करना जिनसे शत्रु निर्बल हो या उसकी हानि हो)
14. माल्यग्रंथनविकल्प कला (माला गूंथना)
15. शेखरकापीड़योजन कला (स्त्रियों की चोटी पर पहनने के विविध अलंकारों के रूप में पुष्पों को गूंथना)
16. नेपथ्यप्रयोग कला (शरीर को वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि से सुसज्जित करना)
17. कर्णपत्रभंग कला (शंख, हाथीदांत आदि के अनेक तरह के कान के आभूषण बनाना)
18. गन्धयुक्ति कला (सुगन्धित धूप बनाना)
19. भूषणयोजन कला
20. इंद्रजाल कला (जादू के खेल)
21. कौचुमार योग कला (बल-वीर्य बढ़ाने वाली औषधियां बनाना)
22. हस्तलाघव कला (हाथों की काम करने में फुर्ती और सफ़ाई)
23. विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकार-क्रिया कला (तरह-तरह के शाक, कढ़ी, रस, मिठाई आदि बनाने की क्रिया)
24. पानकरस-रागासव-योजन कला (विविध प्रकार के शर्बत, आसव आदि बनाना)
25. सूचीवान कर्म कला (सुई का काम, जैसे सीना, रफू करना, कसीदा काढ़ना, मोजे-गंजी बुनना)
26. सूत्रक्रीड़ा कला (तागे या डोरियों से खेलना, जैसे कठपुतली का खेल)
27. वीणाडमरूकवाद्य कला
28. प्रहेलिका कला (पहेलियां बूझना)
29. प्रतिमाला कला (श्लोक आदि कविता पढ़ने की मनोरंजक रीति)
30. दुर्वाचकयोग कला (ऐसे श्लोक आदि पढ़ना, जिनका अर्थ और उच्चारण दोनों कठिन हों)
31. पुस्तक-वाचन कला
32. नाटकाख्यायिका-दर्शन कला
33. काव्य समस्यापूरण कला
34. पट्टिकावेत्रवानविकल्प कला (पीढ़ा, आसन, कुर्सी, पलंग, मोढ़े आदि चीज़ें बेंत बगेरे वस्तुओं से बनाना)
35. तक्षकर्म कला (लकड़ी, धातु आदि को अभष्टि विभिन्न आकारों में काटना)
36. तक्षण कला (बढ़ई का काम)
37. वास्तुविद्या कला
38. रूप्यरत्नपरीक्षा कला (सिक्के, रत्न आदि की परीक्षा करना)
39. धातुवाद कला (पीतल आदि धातुओं को मिलाना, शुद्ध करना आदि)
40. मणिरागाकर ज्ञान कला (मणि आदि का रँगना, खान आदि के विषय का ज्ञान)
41. वृक्षायुर्वेदयोग कला
42. मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि कला (मेंढे, मुर्गे, तीतर आदि को लड़ाना)
43. शुकसारिका प्रलापन कला (तोता-मैना आदि को बोली सिखाना)
44. उत्सादन-संवाहन केशमर्दनकौशल कला (हाथ-पैरों से शरीर दबाना, केशों का मलना, उनका मैल दूर करना आदि)
45. अक्षरमुष्टि का कथन (अक्षरों को ऐसी युक्ति से कहना कि उस संकेत का जानने वाला ही उनका अर्थ समझे, दूसरा नहीं; मुष्टिसकेंत द्वारा बातचीत करना, जैसे दलाल आदि कर लेते हैं),
46. म्लेच्छित विकल्प कला (ऐसे संकेत से लिखना, जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे)
47. देशभाषा-विज्ञान कला
48. पुष्पशकटिका कला
49. निमित्तज्ञान कला (शकुन जानना)
50. यन्त्र मातृका कला (विविध प्रकार के मशीन, कल, पुर्जे आदि बनाना)
51. धारणमातृका कला (सुनी हुई बातों का स्मरण रखना)
52. संपाठ्य कला
53. मानसी काव्य-क्रिया कला (किसी श्लोक में छोड़े हुए पद को मन से पूरा करना)
54. अभिधानकोष कला
55. छन्दोज्ञान कला
56. क्रियाकल्प कला (काव्यालंकारों का ज्ञान)
57. छलितक योग कला (रूप और बोली छिपाना)
58. वस्त्रगोपन कला (शरीर के अंगों को छोटे या बड़े वस्त्रों से यथायोग्य ढँकना)
59. द्यूतविशेष कला
60. आकर्ष-क्रीड़ा कला (पासों से खेलना)
61. बालक्रीड़नक कला
62. वैनयिकी ज्ञान कला (अपने और पराये से विनयपूर्वक शिष्टाचार करना)
63. वैजयिकी-ज्ञान कला (विजय प्राप्त करने की विद्या अर्थात् शस्त्रविद्या)
64. व्यायामविद्या कला इनका विशेष विवरण जयमंगल ने कामसूत्र की व्याख्या में किया है।
उज्जैन में सांदीपनि आश्रम। उज्जैन में सांदीपनि आश्रम।
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आश्रम में स्थित इस मंदिर में हैं 6000 हजार साल पुराना शिवलिंग। आश्रम में स्थित इस मंदिर में हैं 6000 हजार साल पुराना शिवलिंग।
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सांदीपनि आश्रम। सांदीपनि आश्रम।
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गोमती कुंड। गोमती कुंड।
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महर्षि सांदीपनि आश्रम जिसमें सुदामा, श्रीकृष्ण और बलराम की प्रतिमाएं हैं।महर्षि सांदीपनि आश्रम जिसमें सुदामा, श्रीकृष्ण और बलराम की प्रतिमाएं हैं।
श्रीकृष्ण के पदचिन्ह।श्रीकृष्ण के पदचिन्ह।
श्रीकृष्ण गुरु के बेटे को यमराज के पास से लाते ह़ुए।श्रीकृष्ण गुरु के बेटे को यमराज के पास से लाते ह़ुए।
उज्जैन में सांदीपनि आश्रम।उज्जैन में सांदीपनि आश्रम।
आश्रम में स्थित इस मंदिर में हैं 6000 हजार साल पुराना शिवलिंग।आश्रम में स्थित इस मंदिर में हैं 6000 हजार साल पुराना शिवलिंग।
सांदीपनि आश्रम।सांदीपनि आश्रम।
गोमती कुंड।गोमती कुंड।
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