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ये हैं इंडिया के ब्लेड रनर, कारगिल वॉर में गंवा चुके पैर फिर भी दौड़े 24 मैराथंस

4 वर्ष पहले
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इंदौर. तब शाम के सवा छह बज रहे थे जब कार्यक्रम की शुरुआत हुई, लेकिन मेजर डी पी सिंह तय वक्त से एक मिनट पहले ठीक 5.59 को अपने पूरे लगेज के साथ वेन्यू पर मौजूद थे। कार्यक्रम से सीधे दिल्ली रवाना होना था उन्हें। मेजर को बताया भी गया कि अभी कुछ देर है। "नो मैटर वॉट... आय विल बी ऑन टाइम...' मिलनेवालों से यही कहते हुए आगे बढ़ गए मेजर। 

यही है फौज का डिसीप्लिन। शहर में चल रही तीन दिनी स्टूडेंट्स एमयूएन में तकरीबन 500 स्टूडेंट`स से मुख़ातिब थे मेजर। मंच पर आते ही दमदार आवाज़ में दोनों भुजाएं उठाकर पूरी ताक़त से उन्होंने कहा "जय हिंद'... शहर के 15 स्कूल्स के 500 बच्चे और हॉल में खड़ा हरेक शख्स उनके सम्मान में खड़े होकर वही नारा दोहरा रहा था। मेजर ने अपनी बात शुरू की। पढ़िए टीम स्पिरिट, एटिट्यूड, फेल्योर और डिसेबिलिटी पर क्या सोचते हैं मेजर :
 
डिसेबिलिटी
जिस्म से कोई अपाहिज नहीं होता। सबसे ख़तरनाक होता है मानसिकता का अपाहिज हो जाना। मेरा पैर कट गया। दो चॉइसेस थीं मेरे पास। या तो थक हार कर बैठ जाऊं या फिर खुद की नई शिनाख़्त करूं। मैंने खुद को फिर खोजा। जब बगैर पैर के दौड़ने की ठानी तो हंसते थे लोग। कहते थे पागल हो गया है। मुझे डिसेबल कहते थे। मेरा एक पैर नहीं है, बम स्कैप्स अब भी मेरे जिस्म में धंसे हैं लेकिन मैं दौड़ता हूं। एक पैर और एक ब्लेड फुट से 24 मैराथंस दौड़ा हूं। तसे बताइए डिसेबल कौन है। कौन है अपाहिज। मैं या वो लोग मुझे डिसेबल कहते हैं।
 
रिलिजन
मेरा चाइल्डहुड डिस्टर्ब्ड रहा। मैं अपने दादा दादी के साथ बड़ा हुआ। मेरे पिता की नौकरी चली गई थी। आर्थिक तंगी थी। माता पिता से दूर बहुत तरह के चैलेंजेस थे लाइफ में। मुझे हर वक्त अफसोस रहता था कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ। दादा दादी ने मुझे बहुत छोटी उम्र से गुरुद्वारे ले जाना शुरू कर दिया। वहां मैंने सिक्खों का गौरवशाली इतिहास जाना। मेरी परवरिश धार्मिक रही। अनुशासन जीवन का हिस्सा रहा। और ये खुशनसीबी थी मेरी।
 
एटिट्यूड
जिस्म, दिल, हुनर और रूह भी जब हारने लगती है ना, तब एटिट्यूड आपको वापस लाता है। मेरे स्कूल में 12वीं का फेयरवेल चल रहा था। मैंने एक गीत गाया। चलते चलते मेरे ये गीत... पहली ही लाइन में मैं बेसुरा हो गया। सब हंस रहे थे मुझपर। लेकिन मैं रुका नहीं। गीत पूरा किया। आखिर में सभी ने खड़े होकर मेरे लिए तालियां बजाईं। विनिंग एटिट्यूड रखिए। नेवर से डाय। यू आर द बॉस ऑफ योर लाइफ।
 
टीम स्पिरिट 
1999 की बात है ये। करगिल युद्ध चल रहा था। एक ब्लास्ट हुआ। आठ किलोमीटर तक मेरे साथी मारे गए। मैं डेढ़ किलोमीटर ही दूर था। खून में सना हुआ था मैं। एक पैर तो वहीं गंवा चुका था। शरीर पर 40 गहरे घाव थे। मेरे चार साथी अपनी जान दांव पर लगाकर मुझे वहां से ले गए। बीच में पाक ऑक्यूपाइड नदी आई। एक साथी को ठीक से तैरना भी नहीं आता था। फिर भी मुझे अस्पताल पहुंचाया उन्होंने। किसी भी क्षण उन्हें गोली लग सकती थी, लेकिन उन्होंने मुझे यूं नहीं छोड़ा। डॉक्टर ने तो मुझे डेड डिक्लेयर कर दिया था, लेकिन मैं लौट आया। मेरी जान मेरे उन साथियों की बदौलत है। यह है पावर ऑफ टीम।
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