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सामाजिक परिवर्तन लाता है साहित्य

6 वर्ष पहले
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monday talk... 75बरस के सतीश दुबे की कहानियां लाई थीं बदलाव

सिटी रिपोर्टर

कुछसाहित्यकार लिखने में यकीन करते हैं। कुछ साहित्यकार अपने लिखे जाने से सामाजिक परिवर्तन भी करते हैं। उन्हें इस बात पर गहरा यकीन होता है कि उनका लिखा सिर्फ पढ़ा ही नहीं जाएगा, उससे समाज में कुछ बदलाव भी होगा। इंदौर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे का यही यकीन है। इसी यकीन पर वे निरंतर आज भी कहानियां, लघुकथाएं और उपन्यास लिख रहे हैं। वे 75 साल के हो रहे हैं और आज भी नियमित अपनी टेबल पर बैठकर पढ़ते-लिखते हैं।

डेराबस्तीका सफरनामा ने किया बदलाव

इंदौरपोस्ट से बातचीत करते हुए वे कहते हैं इस पर लंबी बहस होती है कि साहित्य बदलाव करता है या नहीं। यह आज भी जारी है और अपने लिखे पर मेरा यकीन इसलिए बढ़ता जाता है कि उसे पढ़कर लोग प्रभावित ही नहीं होते, बदलाव के लिए सक्रिय भी होते हैं। इसकी दो मिसाले हैं। दो-तीन किस्से हैं। चार-पांच साल पहले मेरा एक उपन्यास प्रकाशित हुआ था-डेराबस्ती का सफरनामा। यह उपन्यास मंदसौर-नीमच के आसपास के इलाके में होने वाले महिलाओं के दैहिक शोषण पर आधारित था कि किस तरह से महिलाओं को वेश्वावृत्ति के लिए विवक किया जाता है। यह जब उपन्यास छपा और लोगों ने इसे पढ़ना शुरू किया और चर्चा हुई तो स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और दोखियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और यह बंद हुआ। इसी उपन्यास से संबंधित एक किस्सा और है। मेरे इस उपन्यास को केंद्र में रखककर इंडिया टुडे ने एक कवर स्टोरी की थी। शीर्षक था देह व्यापार के कबीले। इसमें उन्होंने मुझे बतौर लेखक शामिल किया था। इसका भी स्थानीय शासन-प्रशासन पर असर हुआ था।