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करोड़ों का घपला उजागर होने पर भी कार्रवाई नहीं

6 वर्ष पहले
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राज्यकर्मचारी गृह निर्माण संस्था के कर्ताधर्ताओं ने दुकानें बनाने के बाद अपने परिचित-रिश्तेदारों को दे दी। इस पूरे मामले की शिकायत को-ऑपरेटिव के जॉइंट कमिश्नर लील कटारे को हुई। उन्होंने संस्था की ऑडिट रिपोर्ट मंगवाकर जांच बैठाई। जांच डिप्टी ऑडिटर आईसी वर्मा ने की।

जांच में इस बात की पुष्टि हो गई कि 121 सदस्यों वाली संस्था ने 16 जनवरी 1978 और 12 सितंबर 1980 को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से ले आउट पास करवाया था। इसमें भगवती अन्नपूर्णा नगर के कार्नर के एक भू-भाग जिसकी साइज लगभग 6500 वर्गफीट है तथा इसके पास सार्वजनिक कुआं एवं मंदिर होने से आवासीय मानकर इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखा गया था, किंतु संस्था ने यह जानकारी छुपाकर नियम विरुद्ध तरीके से नगर निगम के पत्र क्रमांक 16021 को अपने हक में बताते हुए इसके व्यावसायिक उपयोग की मंजूरी ले ली। रिपोर्ट में यह भी लिखा है की संस्था द्वारा अपने परिचित-रिश्तेदारों को इस जगह बनाए कॉम्प्लेक्स में दुकानें दे दी गईं। इस संबंध में संस्था के मुरलीधर छपरवाल और मनोहर ढोके को जॉइंट कमिश्नर को-ऑपरेटिव कटारे ने नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन उनके द्वारा कोई भी जवाब नहीं दिया गया।

तीनहजार फीट जमीन से कैसे गायब हो गया मंदिर और कुआं

अफसरोंको इस बात का अचरज है की राज्य कर्मचारी गृह निर्माण संस्था के कर्ताधर्ताओं ने सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर से कुआं और मंदिर गायब कर दिया। सहकारिता विभाग अब सबसे पहले कुआं और मंदिर खोजने की कसरत करेगा कि आखिर ये दोनों गए कहां?