बुद्धि की शुद्धि का सरल माध्यम है भागवत
मानवजीवन दुर्लभ है, इसकी मंजिल मोक्ष है। कलियुग में सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि हमें भारत भूमि में जन्म मिला और भागवतमय बुद्धि भी। आज वैचारिक पवित्रता की जरूरत पूरे राष्ट्र को है। भागवत बुद्धि की शुद्धि का सहज-सरल माध्यम है। विचारों से ही जनमत तैयार होता है।
ये विचार देवकीनंदन ठाकुर ने आईटीआई रोड स्थित मां कनकेश्वरीधाम में चल रहे सात दिनी भागवत ज्ञानयज्ञ के समापन पर मंगलवार को व्यक्त किए। उन्होंने कहा- हमें कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है, इसलिए हमारे कर्म ऐसे हों कि किसी को भी दु:ख नहीं पहुंचे। दूसरों का हक मारकर किया गया कर्म फलीभूत नहीं होता। हक छीनने वालों को सजा मिलती ही है।
ठाकुरजी ने कहा- जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आत्मा कभी नहीं मरती, वह परमात्मा का ही स्वरूप है। मौत तो तय है, उससे डरना नहीं चाहिए। भागवत ऐसा कल्पवृक्ष है जिसकी शरण में आने वाले, भूले-भटके से भी पहुंचने वाले के शुभ मनोरथ साकार होते हैं। यह ऐसा महासागर है जो जीवन को शृंगारित करने के अनेक अलंकरणों से भरा हुआ है। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला के आतिथ्य में हजारों भक्तों ने मुख्य यजमान विजय मित्तल के साथ भागवतजी को नाचते-गाते हुए विदाई दी। संचालन राजेश चौहान ने किया।
भागवत ज्ञानयज्ञ के समापन पर आखिरी दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।