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दूसरों की जान बचाते हुए मिली तो बस तकलीफें

7 वर्ष पहले
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भोपालगैस कांड के भयावह मंजर को याद करते हुए रामसिंह बताते हैं शरीर को कंपा देने वाली सर्द रात में मैं अपने चार-पांच जवानों और ड्राइवर अर्जुनसिंह के साथ यूनियन कार्बाइड के पास के रासली गांव से गश्त कर लौट रहा था। गाड़ी ने फैक्ट्री के पास रेलवे क्रॉसिंग पार किया कि चीखते-तड़पते लोग दिखाई दिए। मैं देखने गाड़ी से उतरा ही था कि कुछ महिलाओं ने अपने बच्चों को गाड़ी में डालकर अस्पताल ले जाने की गुहार लगाई। मैं कुछ समझता तब तक मेरी भी आंखों और सीने में जलन होने लगी। फिर किसी ने बताया कि यूनियन कार्बाइड से निकल रही जहरीली गैस से ऐसा हो रहा है। मैंने खुद को संभाला और पहले बच्चों बाद में अन्य लोगों को सीधे अस्पताल ले गया।

इसी दौरान जैसे-तैसे तत्कालीन एसपी स्वराज पुरी को सूचना दी और मदद भेजने को कहा। लोगों को अस्पताल छोड़कर दोबारा वहां गया तो नजारा खौफनाक हो चुका था। सारी रात ड्राइवर अर्जुन और मैं लोगों को अस्पताल पहुंचाने में लगे रहे। जहरीली गैस का प्रभाव इतना था कि लोगों का बच पाना मुश्किल था। अगली सुबह मैंने मृत लोगों का पंचनामा बनाना शुरू किया। गैस कांड के दौरान पांच दिन तक बिना रुके और बिना थके ड्यूटी करना पड़ी। मैंने अपना फर्ज निभाया, लेकिन सरकार ने कभी पलटकर इसे पहचान नहीं दी।

सालोंसे लगा रहे गुहार

अपनीपरवाह किए बगैर लोगों की जान बचाने वाले चाहत रामसिंह अब तक पुलिस महकमे के कई अफसरों से राष्ट्रपति पदक दिलाने की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। हाल ही में उन्होंने अपनी बहादुरी के लिए डीजीपी से मुलाकात की, लेकिन डीजीपी ने हादसों को 30 साल होने का हवाला देकर किसी तरह का पदक या सहायता देने से इनकार कर दिया। प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक रामसिंह ने अर्जी लगाई है, लेकिन अब तक किसी ने भी उनकी बहादुरी को सराहने की कोशिश तक नहीं की है।

महकमेने ही भुला दिया

तमामदु:ख और तकलीफ सहने वाले 80 बरस के इस शेर को अपने महकमे के इस बेरुखे रवैये की उम्मीद नहीं थी। 1990 में डीएसपी के पद से रिटायर हुए चाहत रामसिंह के जख्म भी हरे हो गए। उन्होंने लोगों की जान बचाने का काम किया, जिसका खामियाजा बीमारियों के रूप में वे आज तक भुगत रहे हैं। इसके बावजूद उनका नाम राष्ट्रपति पदक के लिए नहीं भेजा गया। रामसिंह और ड्राइवर अर्जुनसिंह दोनों ने अपनी जान दांव पर डालकर