- Hindi News
- एक गोली लेना हो तो भी दस गोलियां खरीदने की मजबूरी
एक गोली लेना हो तो भी दस गोलियां खरीदने की मजबूरी
दवाव्यवसायी और डॉक्टरों के दवाइयों के पूरे पत्ते ही बेचने पर अलग-अलग तर्क हंै। दवा विक्रेता कहते हैं कि विशेष बीमारियों में काम आने वाली दवाओं की मांग कम और कीमत अधिक होती हैं। इन्हें काटकर कुछ गोलियां बेचें तो बची दवाएं किसी काम नहीं पाती हैं, इसलिए पूरी स्ट्रिप बेचते हैं। दवा कंपनी भी स्ट्रिप ही वापस लेती हैं। जिन दवाइयों की स्ट्रिप बेची जाती है वे काफी महंगी होती हैं और दवा विक्रेताओं को स्ट्रिप में फायदा होता है।
प्रदेशभर के मरीजों को ऐसी मजबूरी में ली गई दवाओं पर हर महीने 50 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ सहन करना पड़ रहा है , अकेले इंदौर में ही यह आंकड़ा हर महीने 15 करोड़ को पार कर रहा है। स्ट्रिप में बिकने वाली 15 हजार प्रकार की दवाओं का मासिक टर्नओवर करीब 30 करोड़ रुपए है यानी 15 करोड़ रुपए की दवाएं मरीजों को जबरदस्ती खरीदना पड़ती हैं, जो काम की नहीं होती हैं। भले ही डॉक्टर ने मरीज को दो या तीन गोली लेने की सलाह दी हो, लेकिन उसे पूरी स्ट्रिप ही बेची जाएगी। डीबी स्टार ने इसकी हकीकत जानने के लिए माइग्रेन के मरीजों के काम आने वाली गोली Ritza 5 mg खरीदनी चाही तो सभी दुकानदारों ने एक या दो गोली देने से साफ इनकार कर दिया गया।
^स्ट्रिप क्योंखरीदें
मुझेमाइग्रेन के लिए डॉक्टर ने जो दवाएं लिखी उनकी एक गोली तीन दिन लेनी थी, लेकिन दवा विक्रेताओं का कहना है कि वे स्ट्रिप में से तीन गोली काट नहीं सकते हैं तो पूरी स्ट्रिप ही खरीदना होगी। तीन गोली सिर्फ 105 रुपए की आती हैं जबकि पूरी स्ट्रिप 350 की होती है।
यशवंतराजपूत, माइग्रेनमरीज
^यह तोगलत है
मरीजको जितनी दवा की जरूरत है मेडिकल स्टोर से वह उतनी दवा खरीद सकता है। जबरन पूरी स्ट्रिप मरीज को बेचना गलत है। अगर ऐसा किया जा रहा है तो मैं अपने ड्रग इंस्पेक्टर्स की टीम भेजकर इसकी जांच करवाता हूं और कार्रवाई करता हूं।
अशोकडागरिया, सीएमएचओ