श्रीनगर की सड़कों पर तैर रही थी लाशें
श्रीनगरजिसे जन्नत कहा जाता है, वहां हालात बहुत ही खराब है। वहां सड़कों पर लाशें तैर रही थीं। हम खुशकिस्मत हैं जो वहां से सकुशल लौट आए। यह बात इंदौर के रेसकोर्स रोड पर रहने वाले प्लास्टिक पैकेजिंग फैक्टरी संचालक पीयूष पटेल ने ‘भास्कर’ को बताई। रविवार शाम वे इंदौर पहुंचे। विमानतल पर उनकी अगवानी करने गए परिजनों की आंखों से आंसू छलक पड़े। उनकी आपबीती उन्हीं की जुबानी। -
मैं प|ी नीमा और मुंबई में रहने वाले दोस्त रमेश उनकी प|ी नीता सोनी के साथ 6 सितंबर शनिवार को श्रीनगर घूमने गया था। जाने से पहले पता था कि वहां बारिश हो रही है, लेकिन हालात इतने बुरे होंगे इसका अंदाजा नहीं था। उसी दिन हमारा गुलमर्ग जाने का प्लान था। गाइड ने बताया कि वहां मौसम बहुत खराब है, इसलिए हम नहीं जा सके। शाम को श्रीनगर में ही घूम रहे थे तो वहां डल झील का पानी बाउंड्रीवॉल के ऊपर रहा था। रविवार भी वहीं बीत गया। सोमवार को मोबाइल के सिग्नल आना बंद हो गए। किसी ने बताया कि रात को झेलम नदी में इतनी तेज बाढ़ आई कि उससे डल झील की एक ओर की पाल टूट गई है और शहर में एक मंजिल तक पानी भर गया। हमारी होटल ऊंचाई पर थी, इसलिए ऐसी कोई परेशानी हमें नहीं हुई, लेकिन होटल में लाइट बंद हो चुकी थी। सुबह-शाम सिर्फ एक-एक घंटे के लिए बिजली आती थी। मोबाइल और लैंडलाइन नेटवर्क बंद हो चुका था। अगले दिन किसी ने बताया कि वहां से 50 किलोमीटर दूर दारा में सिग्नल मिल रहे हैं तो हम वहां पहुंचे, लेकिन वहां भी सिग्नल नहीं मिल रहे थे। स्थानीय लोगों ने परेशान देख अपना फोन हमें दिया। उससे अमेरिका में रह रही बेटी को फोन पर बताया कि वे ठीक हैं, सभी को इसकी सूचना दे दें। हमें छह दिनों के इस टूर में गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम जाना था, लेकिन हम श्रीनगर से बाहर भी नहीं जा पाए। होटल में राशन खत्म होने लगा था। पिछले तीन दिनों से हमें पांच सितारा होटल होने के बाद भी सिर्फ दाल-चावल ही मिल पा रहे थे। शनिवार को हमारी श्रीनगर से इंदौर के लिए रिटर्न फ्लाइट थी। हमें बता दिया गया था कि होटल से एयरपोर्ट तक का आधे घंटे का रास्ता पार करने में तीन घंटे से ज्यादा लगेंगे, इसलिए हम सुबह जल्दी होटल से निकल गए। मार्ग का अधिकांश भाग पानी में डूबा हुआ था, जब कार से बाहर देखा तो हम डर गए पानी में कई इंसानों और जानवरों की लाशें तैर रही थीं। जैसे-तैसे एयरपोर्ट पह