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हमारी संस्कृति में विवाह संस्कार है, अनुबंध नहीं
बंधनमें कोई रहना नहीं चाहता, लेकिन विवाह का बंधन ऐसा है जो सभी को बांधे रखता है। यह सबसे पवित्र और मजबूत होता है। हमारी संस्कृति में विवाह को संस्कार माना गया, अनुबंध या सौदा नहीं। पश्चिमी संस्कृति ने विवाह के नाम को विकृत बना दिया, जहां सात दिन में ही पति-प|ी भूतपूर्व हो जाते हैं जबकि हमारी संस्कृति में यह सात जन्मों का बंधन है। पति-प|ी के रिश्ते विश्वास की डोर से बंधे होते हैं। मर्यादा को हमारे यहां आभूषण माना गया है। भारतीय समाज इसी बुनियाद पर खड़ा है। ये विचार देवकीनंदन ठाकुर ने भागवत ज्ञानयज्ञ में सोमवार को श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह उत्सव में व्यक्त किए। आयोजन आईटीआई रोड स्थित मां कनकेश्वरी धाम में किया जा रहा। मुख्य यजमान विजय मित्तल थे।
ठाकुरजी ने आगे कहा- भगवान को तन-मन-धन भी समर्पित कर दें तो कम है क्योंकि यह सब उन्हीं का दिया हुआ है। हमारे साथ कुछ नहीं जाएगा, जाएंगे तो केवल हमारे पुण्य। इसलिए सद्कर्म करते चलें। इस मौके पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, शंभुदयाल अग्रवाल, अजय मित्तल, प्रेमचंद गोयल, किशोर गोयल आदि उपस्थित थे।
मां कनकेश्वरी मैदान में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में भजनों की धुन पर श्रद्धालु थिरकने लगे।