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ज्ञान में अहंकार का भाव नहीं हो : स्वामी हरियोगी
वेदांतका दर्शन तभी सार्थक होगा, जब मन शुद्ध और चित्त बुद्ध बनेगा। ज्ञान में अहंकार नहीं होना चाहिए। आचरण की पवित्रता और मन की निर्मलता के बिना तो भक्ति स्थिर रहेगी, ही ज्ञान। विकृति को संस्कृति में बदलने के लिए वेदांत का मनन-मंथन जरूरी है।
यह बात स्वामी हरियोगी ने मंगलवार को अखंडधाम आश्रम में चल रहे अ.भा. अखंड वेदांत संत सम्मेलन में कही। महामंडलेश्वर जगदीशानंद ने कहा- संतों एवं धर्मग्रंथों के आश्रय से सुख नहीं, शांति मिलती है। भौतिक साधन सुख दे सकते हैं, शांति नहीं। महामंडलेश्वर राधे राधे बाबा ने कहा- संत भक्त और भगवान के बीच सेतु का काम करते हैं। डॉ. रमेशाचार्य ने कहा- रामचरित मानस भारत के आदर्श परिवार और समाज का प्रतिबिंब है। संत अमृतराम रामस्नेही ने कहा- जीवन का प्रत्येक लक्ष्य शरीर के माध्यम से ही पूरा होता है। महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी चेतन स्वरूप ने कहा- वेदांत मनुष्य की वेदनाओं के अंत का केंद्र है। अध्यक्ष हरि अग्रवाल ने कहा- बुधवार को दोपहर 2 बजे से प्रवचन होंगे।