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प्रणाली पर ही सवाल

7 वर्ष पहले
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राज्यसरकार द्वारा नवनिर्मित 10 वित्तीय सलाहकार के पदों में से पांच पर वित्त एवं लेखा सेवा के अफसरों की नियुक्ति की गई है। इन्हें वित्त सलाहकार के अलावा विभागाध्यक्ष कार्यालय में वित्तीय अधिकारी का प्रभार भी सौंपा गया है। वित्त सलाहकार प्रणाली में अधिकारियों को वित्त विभाग के महत्वपूर्ण अधिकार मिलने से अब इस प्रणाली पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।

लागूहोने से पहले विवाद शुरू

वित्तीयसलाहकार विभागाध्यक्ष जो बजट, वित्त एवं लेखा संबंधी प्रस्ताव बनाएगा, बाद में उन्हीं का परीक्षण स्वीकृति भी देगा। यूं भी यह पद संचालक स्तर का है, लेकिन इस पर अपर संचालक स्तर के अधिकारियों को पदस्थ किया गया है। बड़े विभागों में वित्तीय सलाहकार का अपर सचिव स्तर का पद है जिस पर ित्त एवं लेखा सेवा या अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की पोस्टिंग का प्रावधान है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, स्कूल शिक्षा, लोक निर्माण एवं लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में अफसरों की पदस्थापना हुई है।

इस मुद्दे पर चर्चा के लिए वित्त मंत्री जयंत मलैया एवं अपर मुख्य सचिव वित्त अजय नाथ से संपर्क का प्रयास किया, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हो सके।

वित्तीय अधिकारियों को बजट से समर्पित राशि के आदेश जारी करना, अस्थायी पदों की निरंतरता जारी करना, राशि को अगले तीन महीने में खर्च करने के आदेश, विभाग के अंतर्गत खोले गए व्यक्तिगत जमा खाता के निरंतरता की स्वीकृति, मदों में निर्धारित व्यय की सीमा से 25 प्रतिशत अधिक व्यय तक की अनुमति, एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में स्थानांतरण के अधिकार, वाहन क्रय की अनुमति, के-डिपाजिट से राशि निकालने की अनुमति देने संबंधी जैसे महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। खास बात यह भी है कि वित्तीय सलाहकार का पद मुख्यमंत्री के संकल्प एवं 100 दिवसीय कार्ययोजना में सम्मिलित होने के बाद सृजित किए गए हैं। बावजूद इसके यह प्रणाली लागू होने के पहले ही विवादों में घिर आई है।