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संगमरमर की सफेदी पर लाल फीते की कालिख का बयान
रंगमंच आर्ट ऑफ ड्रामा ने रविवार को आनंदमोहन माथुर सभागृह में नाटक \\\'ताजमहल का टेंडर\\\" का मंचन किया।
अभिनय
गुप्ताजीकी भूमिका में पंकज शर्मा ने बेहतरीन अभिनय का मुजाहिरा किया है। लव विस्पुते (सुधीर), कुलदीप सहगल (भैय्याजी), शब्बीर मोदी अनंत तिवारी (नेता), मयंक सरसिया (शर्माजी), शीतल ओझा (मैडम चड्ढा) और दरबारियों की भूमिका में तुषार रामडिया, रोहित नामदेव राहुल भट्ट अपनी भूमिकाओं से न्याय करने में कामयाब नजर आते हैं। कई बार उर्दू के लफ़्जों की गलत अदायगी (नुक्तों की समस्या) अखरने वाली है। शाहजहां की भूमिका में संदीप दुबे आत्मविश्वास से भरा और दमदार हास्य रचने में कमतर दिखाई दिए।
निर्देशन
बतौरनिर्देशक संदीप दुबे के पास कुछ नया कर दिखाने का अवसर था जिसका सदुपयोग करने में वे पूर्णतः सफल नहीं हैं। अधिकांशतः मूल नाट्यालेख के साथ चिपके रहने का विकल्प चुनने के बावजूद स्क्रिप्ट की इन-बिल्ट कॉमेडी का दोहन भी कंजूसी से किया है। औसत हास्य प्रस्तुति के रूप में पेश किए गए नाटक को एक जबरदस्त ठहाकेदार पेशकश बनाए जाने की पूरी संभावना मौजूद है। हिंदी दिवस के अवसर पर नाटक के टाइटल्स स्क्रीन पर अंग्रेजी में थे।
आदिल कुरैशी :इंदौर
आईआरसीटीसीके उच्चाधिकारी अजय शुक्ला द्वारा लिखित हास्य-व्यंग्य और सरकारी तंत्र पर तीखे कटाक्ष के तत्वों से भरपूर नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’ का मंचन रविवार को आनंदमोहन माथुर सभागृह में किया गया।
कहानी
आजके दौर में यदि मुगल शहंशाह शाहजहां, बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल बनाने का फैसला करते तो क्या हश्र होता। यही कल्पना नाटक की कथावस्तु है। ताजमहल बनाने का हुक्म मिलते ही अपनी ब्यूरोक्रेसी सक्रिय हो जाती है और शहंशाह को अपना सपना पूरा करने में नाकों चने चबवा देती है। भ्रष्टाचार, खुदगर्जी, लचर कार्यप्रणाली और भूमाफियाओं, सियासतदानों सरकारी विभागों के बीच सांठगांठ जैसी आज के दौर की विसंगतियां हास्य के माध्यम से नाटक उभारता है। चीफ इंजीनियर गुप्ताजी अपने पीए सुधीर के साथ मिलकर पूरे प्रोजेक्ट को चाट जाते हैं। नेता, अफसर, ठेकेदार सभी अपना हिस्सा लेते जाते हैं मगर शहंशाह की ख्वाहिश खत्म होती नजर आती है।
Drama review