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हिंदी-मराठी की मां और मौसी जैसी जुगलबंदी

7 वर्ष पहले
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हिंदीदिवस के ठीक एक दिन पहले शनिवार शाम शहर में ऐसा कार्यक्रम हुआ जिसमें दो भाषाओं की जुगलबंदी नजर आई। भाषाओं को अगर रिश्तों में पिरोएं तो कम से कम इंदौर के लोग तो हिंदी को मां और मराठी को उसकी मौसी जरूर मानेंगे।

इसी भावना के साथ मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के गोवर्धनलाल ओझा सभागृह में ‘आम्ही रचनाकार’ समूह का कार्यक्रम ‘माय मावशी’ हुआ। इसमें मराठी-हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार अलकनंदा साने ने अनुभव से उपजी मराठी रचनाएं सुनाईं। युवा रचनाकार नीलेश शेवगांवकर ने उर्दू मिश्रित हिंदी में गजलें पेश कीं। अलकनंदा साने की रचनाएं श्रोताओं के मन में गहरे तक उतर गईं। चाहे वह मातृत्व सृजन का सुखद दर्द बोती प्रसिद्ध रचना ‘आई’ हो, समय के साथ बदलती पीढ़ी का मार्मिक चित्रण करती कविता ‘मुली’ हो, या बिटिया को अभिमन्यु के समान शिक्षा देनेवाली मां हो, सभी रचनाओं ने भरपूर दाद बटोरी।

अलकनंदा साने

मदद करने अली के साथ राम भी आएं...

युवा रचनाकार नीलेश शेवगांवकर ने गजलों में सांप्रदायिक सौहार्द्र के विषय को स्पर्श किया। उनकी गजल की पंक्तियां कुछ इस तरह थीं- “फ़क़त इतनी सी है ख्वाहिश, जनाज़ा जब उठे मेरा/ अली थकने जो लग जाए, मदद को राम भी आए।“ वहीं दुनिया की क्षणभंगुरता को उकेरते शब्द “खेल हो बच्चों का जैसे, छोड़ दी यूँ सल्तनत, गेरुए कपड़ों में गौतम ने गुज़ारा कर लिया” ने नवीन संभावनाओं को जगाया। ‘आम्ही रचनाकार’ समूह के सदस्य संदीप भालेराव और वैभव पुरोहित ने कार्यक्रम को खूबसूरती से सूत्र में पिरोया।

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