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58 साल से युवा रंगकर्मियों के लिए समर्पित संस्था
इंदौरमें रंगकर्म को लेकर बेहतहीन काम हो रहा है। यहां ने केवल अच्छे नाटक मंचित किए जा रहे हैं बल्कि वर्कशॉप में नई पीढ़ी को रंगकर्म के लिए बेहतर ढंग से प्रशिक्षित किया जा रहा है। इस दिशा में यहां की हिंदी और मराठी नाट्य संस्थाएं केवल लगातार रंगकर्म कर रही हैं बल्कि देशभर में नाट्य स्पर्धाओं में शामिल हो कर अवॉर्ड भी हासिल कर रही हैं। इनमें कुछ संस्थाएं युवा रंगकर्मियों में रंगकर्म के संस्कार भी पैदा कर रही हैं और उन्हें प्रशिक्षित करते हुए उनमें रंगकर्म के प्रति प्रतिबद्धता का जज्बा भी पैदा कर रही हैं। एक ऐसी ही संस्था है श्री अहिल्या नाट्य मंडल। इसकी स्थापना इंदौर के इतिहासकार और लेखक गणेश मतकर ने 2 अक्टूबर 1956 को की थी।
हिंदीऔर मराठी में किए नाटक
मंडलके सुनील मतकर कहते हैं कि डॉ. गणेश मतकर ने आम लोगों में रंगकर्म के संस्कार पैदा हो सकें इसलिए मोती तबेला में इस संस्था की शुरुआत की। उन्होंने वीर श्रेष्ठ नाटक लिखा जो महाराजा यशवंतराव होलकर प्रथम पर लिखा था। उन्होंने इस एक पात्रीय नाटक में महाराजा की भूमिका भी की। इसके बाद अहिल्या बाई पर नाटक लिखा जो महेश्वर में खेला था। इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र की राज्य स्पर्धा में नाटक किए जिन्हें तीन अवॉर्ड हासिल हुए।
इंदौरमें बाल नाट्य के जनक
सुनीलमतकर कहते हैं कि डॉ. गणेश मतकर ने 1970 से इंदौर जनरल लाइब्रेरी के साथ इंदौर में पहली बार बाल नाट्य की शुरुआत की। शिविर लगाए और बच्चों में रंगकर्म के संस्कार पैदा किए। उनकी मृत्यु के बाद मैंने इस संस्था की बागडौर संभाली और तब से अब तक लगातार मराठी और हिंदी रंगकर्म के लिए नाटक कर रहे हैं। इसके तहत शिविर कर रहे हैं, नाट्य स्पर्धाओं में भाग ले रहे हैं और गणेशोत्सव के साथ ही शहर की स्पर्धाओं में कॉम्पीट भी कर रहे हैं।
युवारंगकर्मी हो सकें तैयार
इससंस्था के बारे में आनंद भट्ट कहते हैं कि मैं नाट्य प्रेमी हूं और इसी नाते इस संस्था में मेरा थोड़ा बहुत कॉन्ट्रीब्यूशन है। श्री अहिल्या नाट्य मंडल रंगकर्म के लिए पूरी तरह से समर्पित संस्था है। इसकी कोशिश रहती है कि यह युवा रंगकर्मियों में नाटक के संस्कार पैदा करना है ताकि नई पीढ़ी बेहतर से बेहतर नाटक कर सकें। इसिलए यह संस्था लगातार रंगकर्म को प्रोत्साहित करती रहती है।
एक नाटक में अभिनय करते डॉ. गणेश मतकर।
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