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टूट चुका है साहित्य और पाठकों के बीच पुल

7 वर्ष पहले
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पहलेछोटी-छोटी गोष्ठियों बैठकों में पाठकों के लिए साहित्य का चित्त बनाया जाता है। इस पुल से ही गुजरकर पाठकों का पत्रिकाओं और किताबों से आत्मीय रिश्ता बनता था। अब यह पुल टूट चुका है। इसका सीधा असर पत्रिकाओं पर पड़ा है। दूसरी ओर व्यावसायिका घरानों ने पत्रिकाओं से हाथ खींच लिए हैं और वे धीरे धीरे बंद होने लगी हैं।

यह बात ख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने कही। वे सोमवार को हिंदी साहित्य समिति में नेशनल बुक ट्रस्ट और रंग प्रकाशन के साझा कार्यक्रम वर्तमान परिदृश्य में पत्रिकाओं की भूमिका विषय पर परिचर्चा में बोल रहे थे।

ताकिकुंद हो सके प्रतिरोध की धार

उन्होंनेकहा कि अब सम्पादक भी पत्रिका के लिए त्याग की जगह तमाम सुख-सुविधाएं चाहते हैं। पहले संपादक सिर्फ और सिर्फ पत्रिका की गुणवत्ता के लिए काम करता था।

साहित्यकार जीवनसिंह ठाकुर ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना जगाने वाली पत्रिकाओं को षड्यंत्रपूर्वक बंद किया गया है ताकि प्रतिरोध की धार को कुंद किया जा सके। साहित्याकर कुसुमलता सिंह ने पत्रिका प्रकाशन में आने वाली कठिनाओं पर प्रकाश डाला। रंग प्रकाशन के मनीष जैन ने भी संबोधित किया। संचालन राकेश शर्मा ने किया और आभार माना एनबीटी के पंकज चतुर्वेदी ने।

प्रभाकर श्रोत्रिय

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