सामूहिक अवचेतन : शिष्य पाठ्यक्रम हो गया
कल 14दिसंबर को राजकपूर का 90वां जन्मदिन है, उनकी मृत्यु को 26 वर्ष हो चुके हैं। आज का दौर ब्रेकिंग न्यूज का है और जीवन भी पढ़े हुए अखबार की तरह कूड़ेदान में फेंका जाता है। हमें हर दिन सुबह आज के अखबार की तलब लग जाती है। आज विगत सप्ताह देखी फिल्म याद नहीं रहती, परिवर्तन की गति से ही सबकी गति शासित है। ऐसे कालखंड में फ्रांस के विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली नेमिसिस नामक लड़की राजकपूर के सिनेमा और विदेश में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर शोध करने भारत आती है और कहीं से जानकारी मिलने पर मुझसे मिलने इंदौर आती है।
राजकपूर के सिनेमा पर कोई एक्सपायरी डेट नहीं है। सन् 1951 में प्रदर्शित आवारा ने रूस में इतनी लोकप्रियता अर्जित की कि वह अघोषित राष्ट्रीय फिल्म हो गई। राज कपूर के सिनेमा पर ख्वाजा अहमत अब्बास और नेहरू के प्रभाव के कारण समाजवादी झुकाव रहा है। कुछ लोगों का ख्याल है कि इसी कारण साम्यवादी देशों में फिल्म ने लोकप्रियता अर्जित की। उनकी फिल्मों को अबुल गमाल मोसल, निकितां ख्रुश्चेव और चाउ इन लाई ने पसंद किया, परंतु भारत के अवाम के साथ खाड़ी देशों में लोकप्रियता का क्या कारण रहा होगा?
दरअसल मानवीय करुणा एवं मनोरंजन पर किसी राजनैतिक दर्शन का ठप्पा नहीं होता। आंसू और मुस्कान सार्वभौमिक हैं। अमेरिका में राजकपूर की फिल्मों का पुनरावलोकन सन् 82 में हुआ और कई शहरों में फिल्में दिखाई गईं। अच्छा है कि युवा नेमिसिस रूसी नहीं थीं अन्यथा समाजवादी रुझान की बात उठती है। सच तो यह है कि घोर पूंजीवादी अमेरिका में भी धनाढ्य व्यक्ति के नायक स्वरूप पर कम ही फिल्में बनती हैं। सिनेमा अवाम का मनपसंद माध्यम है और समाजवाद कोई गाली नहीं है। इस विचारधारा से प्रभावित रहे हैं बर्नाड शॉ, बट्रेंड रसेल और अनेक विद्वान। सच तो यह है कि राइटिस्ट प्रभाव ने कभी महान लेखक या विचारक दिए ही नहीं और इसका सीधा कारण यह है कि अधिकतम व्यक्तियों की व्यथा-गाथा से कौन प्रभावित नहीं होता। पूंजीवादी अमेरिका ने चार्ली चैपलिन को सर्वकालिक महान माना और पुरस्कृत किया। सत्यजित रॉय की श्रेष्ठतम रचना में गांव के गरीब परिवार का दर्द है, तो क्या आप उन्हें समाजवादी करार देंगे? दरअसल राजनैतिक नारेबाजी से पटी है आम मनुष्य की व्यथा-गाथा।
बहरहाल, राजकपूर के सिनेमा में ऐसा कुछ है जिसे हर कालखंड और हर राजनैतिक दर्शन को मानने वाला