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गैस से चलाए जा सकेंगे जनरेटर एवं गीजर

7 वर्ष पहले
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रेबोबिनमशीन में रोज का बचा हुआ 50 से 500 किलोग्राम खाना डाला जा सकता है। शुरुआत में मशीन पूरी भरने के 15 दिन बाद मीथेन गैस बनना शुरू होती है। इसके बाद रोजाना गैस उत्पादन किया जा सकता है। इससे बनने वाली मीथेन गैस से किचन में ही खाना बनाने के साथ ही जनरेटर और गीजर सहित बिजली के अन्य उपकरण भी चलाए जा सकते हैं।

पहलीबार आईपीएस में हुई इंस्टाल

आईएसअकादमी में रोजाना करीब 200 किलो किचन गारबेज निकलता है। इसमें सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाना इत्यादि शामिल है। इसी गारबेज को प्रोसेस कर गैस बनाने के लिए 100 किलोग्राम क्षमता वाला संयंत्र लगाया गया है। हालांकि यह अभी तक प्रायोिगक स्तर पर है, लेकिन बैंगलोर, पुणे सहित अन्य शहरों की रिपोर्ट के मुताबिक इतनी क्षमता में रोजाना 18 किलो ग्राम मीथेन गैस का उत्पादन किया जा सकता है। यहां करीब 3000 बच्चों का खाना बनाने के लिए रोजाना करीब चार सिलेंडर गैस खपत होती है और बचे हुए खाने का अब तक कोई उपयोग नहीं हो पाता था, लेकिन अब यही बचा हुआ खाना एक से डेढ़ सिलेंडर गैस का उत्पादन करने के काम आएगा। आईपीएस की तर्ज पर शहर के 15 अन्य स्कूल-कॉलेज यह संयंत्र लगाने की तैयारी में हैं।

हरघर से 450 ग्राम किचन गारबेज

एकसर्वे के मुताबिक इंदौर में हर घर से औसतन 450 ग्राम किचन गारबेज निकलता है। इसमें सब्जियों के छिलके, सड़ी हुई सब्जियां, बचा हुआ खाना इत्यादि शामिल है। ज्यादातर लोग यह बचा हुआ खाना कचरे में फेंक देते हैं। यही कचरा ट्रेंचिंग ग्राउंड में प्रोसेस किया जाता है जिससे आर्गेनिक खाद बनाई जाती है, लेकिन यह बचा हुआ खाना अब वापस किचन में उपयोग किया जा सकता है यानी यदि यह शुरुआत पूरे शहर में लागू होने की संभावना बन जाए तो गैस की खपत भी बचेगा और निकलने वाला कचरा भी कम होगा।

हमने देशभर के कई शहरों में इसका सर्वे कर यह निष्कर्ष निकाला कि हम आमतौर पर किचन से निकला हुआ कचरा अन्य कचरे के साथ फेंक देते हैं। हमारी कोशिश है कि कचरा जहां से निकलता है यदि वहीं खत्म कर दिया जाए। रेबोबिन में बचा हुआ खाने गैस बनाने के काम आता है। अन्य गैस संयंत्रों से प्रेरित होकर यह मशीन बनाई है। हेमंतअठलावकर, निर्मातारेबोबिन

^ताकि कचराजहां निकलता है वहीं खत्म हो

^मशीन फिलहालट्रायल पर है

स्कूलमें रोज शाम को 200 किचन गारबेज निकलता है। अब हमने रेबोबिन मशीन लगाई है। मशी