हमारा जिला अस्पताल सिर्फ रेफरल सेंटर
स्वास्थ्यविभाग के प्रमुख सचिव प्रवीर कृष्ण मंगलवार को व्यवस्था का जायजा लेने इंदौर आए। जिला अस्पताल, पीसी सेठी और हुकमचंद पॉलीक्लिनिक में दो दिन पहले बनाए गए स्क्रीनिंग सेंटर देखकर वे खुश भी हो गए। नर्सिंग स्टाफ एक घंटा पहले तक स्वाइन फ्लू के ए, बी और सी कैटेगरी के लक्षण इलाज की बात कह रहा था। जिला अस्पताल की हालत तो यह थी कि यहां तो बीमारी से निपटने के लिए वेंटीलेटर है और ही आईसीयू। पूरी जिम्मेदारी चिकित्सा शिक्षा विभाग के मेडिकल कॉलेज पर डाल दी गई है जबकि भोपाल में जिला अस्पताल में व्यवस्था की गई है।
जिला अस्पताल में चार साल पहले ट्रामा सेंटर, माइक्रोबायोलॉजी लेबोरेटरी के लिए पौने पांच करोड़ रुपए मंजूर हुए थे। अभी तक प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। टेमीफ्लू के लिए सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को सीएमएचओ कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। पीएस खुद के अस्पतालों में व्यवस्था देखने पहुंचे। वे पूरे निरीक्षण में सर्दी-जुकाम के मरीजों का आंकड़ा पूछते रहे। बार-बार यही दोहराते रहे कि सी-कैटेगरी में मरीज पहुंच रहे हैं। उन्हें पहचानने में देरी कर रहे हैं। उन्होंने यह खुद स्वीकारा कि स्वाइन फ्लू की मृत्युदर 30 से 40 प्रतिशत है, जबकि दिल्ली में यह एक प्रतिशत ही है। हालांकि डॉक्टर्स इसका जवाब नहीं दे पाए कि इतने मरीजों की मौत क्यों हुई।