खंडवा. खरगोन जिले के महेश्वर में हो रहे अतिरात्र सोमयज्ञ में पहुंचे 15 देशों के 80 विदेशी मेहमान भारतीय संस्कृति को जैसे जी रहे हैं। अग्निहोत्र क्रिया (एक प्रकार का हवन) को अपनाकर उन्होंने अपना जीवन बदल लिया। इनकी सुबह इस क्रिया को करने से होती है और रात भी।
कोई 36 साल से कर रहा हैं तो कोई छह साल से। कुछ विदेशी ऐसे भी हैं जो पहली बार इस क्रिया को करने महेश्वर आए। क्रिया के मंत्र इतनी सहजता से बोल लेते हैं कि हर कोई इन्हें देखता ही रह जाए। इतना ही नहीं वे अपने देश जाकर इसका प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं।
महेश्वर में होमाथेरेपी गोशाला के सर्वजीत परांजपे ने बताया वसंत परांजपे गुरुजी से प्रेरित होकर विदेशी मेहमान हर बार सोमयज्ञ में शामिल होने आते हैं। इस बार 15 देशों से 80 मेहमान आए। सोमयज्ञ की विधि इन्हें उनकी भाषा में ट्रांसलेट कर सुनाई जाती हैं। अग्निहोत्र क्रिया के अलावा दूसरे मंत्र भी आसानी से जप लेते हैं।
रविवार को सोमयज्ञ के छठे और अंतिम दिन विदेशी मेहमानों ने ढोल की थाप पर फुगड़ी खेली, भारतीय नृत्य किया और नर्मदा स्नान कर नर्मदा मैया के जयकारे भी लगाए।
इन देशों के लोग आए थे : रशिया, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, पौलेंड, जर्मनी, ब्राजील, चीली, पेरू, ऑस्ट्रिया, तुर्कीस्तान, अमेरिका, कोस्टारिका, पुर्तगाल, कजाकिस्तान, कनाड़ा, किरगीस रिपब्लिक
अब मेरी घर वापसी हुई
जर्मनी में जन्म से अपाहिज बच्चों के लिए काम करने वाली थैरेपिस्ट मेरीऑन हाफशील्ड कहती है भारत की संस्कृति को मैंने तब करीब से जाना जब अग्निहोत्र किया। पर्यावरण को लेकर मैं चिंतित थी। इच्छा थी कि कुछ अच्छा काम करूं। 49 वर्षीय मेरीऑन कहती है पहली बार ही मैंने अग्निहोत्र किया तो लगा जैसे मेरे अंदर सारी चीजें पहले से थी, लेकिन उस पर पर्दा पड़ा था। उन्होंने कहा मैंने घर में ही अग्निहोत्र करने की व्यवस्था कर रखी है। दोनों वक्त यह करने से मैं खुद को यंत्र की तरह महसूस करती हूं।
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