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मुश्किल रहा मजदूरी से लेकर प्लाटून कमांडर तक का सफर

9 वर्ष पहले
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इंदौर . मिल मजदूर से प्लाटून कमांडर तक का सफर बहुत मुश्किल था। माता-पिता के आशीर्वाद और गुरुजनों के मार्गदर्शन में मैंने इसे तय किया। बचपन से देश सेवा का जो सपना था अब वह पूरा करूंगा।
यह बात बुधवार सुबह रुस्तमजी सशस्त्र पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय 15वीं वाहिनी में 64 प्लाटून कमांडरों के दीक्षांत समारोह के बाद प्लाटून कमांडर बने रविशंकर कौशल ने कही। मुरैना के रविशंकर को शपथ लेते देखने के लिए माता-पिता भी आए थे। दोनों ने जब लाडले को वर्दी में देखा तो आंखें छलक उठीं। रविशंकर ने बताया पिता खेती करते हैं और घर में एक छोटा भाई और तीन बहनें हैं। पिता के पास पढ़ाई के पैसे नहीं थे। मैंने मिल में काम कर ग्रेजुएशन किया।
इसके बाद यहां के लिए चयन हो गया। उन्होंने बताया यहां आने पर यूनिफॉर्म सहित अन्य चीजों के लिए 25 हजार रुपए जमा करने होते हैं, लेकिन मेरे पास पांच हजार ही थे। अधिकारियों ने यह देख कुछ दिन की छूट दे दी। इस दौरान पिता ने गांव में पैसे उधार लेकर पहुंचाए। अब प्लाटून कमांडर बनकर देश सेवा के साथ परिवार की जिम्मेदारी उठाऊंगा।
खाना मिल सके इसलिए पकाया खाना
मंदसौर के बेसोदा गांव में रहने वाले राहुल नूरदिया ने बताया माता-पिता ने सिलाई करके राहुल और बड़े भाई चंद्रप्रकाश की पढ़ाई के लिए पैसे इकट्ठे किए। इंदौर के होलकर साइंस कॉलेज में पढ़कर ग्रेजुएशन पूरा किया। सेना या पुलिस में आना था, इसलिए एनसीसी ज्वॉइन की।
खाने के लिए ज्यादा पैसे नहीं होते थे, इसलिए दो सालों तक दोनों भाइयों ने एनसीसी मेस में खाना बनाया, ताकि मुफ्त खाना मिल सके। किताबों के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए सेंट्रल लाइब्रेरी का सहारा लिया। बड़ा भाई भोपाल में स्पेशल ब्रांच की ट्रेनिंग पूरी कर रहा है और राहुल ने यहां प्लाटून कमांडर की ट्रेनिंग पूरी की। उसे वर्दी में देख माता-पिता रो पड़े। परेड की सलामी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक केसी वर्मा ने ली।
आज पिताजी होते तो फूले न समाते
छिंदवाड़ा के अली भानसा मर्सकोले ने बताया उनके पिता मंगलू शाह गांव के सरपंच थे। वे चाहते थे बेटा अफसर बने। 2008 में उनका देहांत हो गया। तब अली जिला पुलिस बल कटनी में आरक्षक थे। पिता की इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने प्लाटून कमांडर बनने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। अली बोले- आज पिता होते तो फूले न समाते।
फोटो- आरक्षक महेश भामदरे ट्यूबलाइटों पर लेट गया। फिर उसके सीने पर रखे पटिए से तीन सवारी बैठाकर बुलेट निकाली गई। उन्होंने भाई गोविंद के साथ कीलों के ऊपर लेटकर एक क्विंटल का पत्थर तुड़वाया। आंखों पर पट्टी बांधकर तलवारबाजी की। पेट से ट्यूबलाइट फोड़ी और पलकों से जमीन में गड़ी सूई को उठाया। इन करतबों को देख सभी अचंभित हो गए।