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डाउनलोड करेंइंदौर. श्री अरबिंदो इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डॉक्टरों की लापरवाही के कारण १६ वर्षीय लड़की की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। उसका ब्लड बी-पॉजीटिव है, लेकिन अस्पताल में उसका ब्लड एबी-पॉजीटिव बताते हुए नौ यूनिट चढ़ा दी गई, जिनमें छह एफएफपी (फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा) थे। दो यूनिट ओ-नेगेटिव ब्लड भी चढ़ा दिया, जबकि दो अन्य अस्पतालों में उसका ब्लड गु्रप बी-पॉजीटिव बताया गया। इलाज के दौरान 17 दिन में ही उसे 16 यूनिट ब्लड दिया गया। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के कारण उसके हाथ में गैंगरीन हो गया है। अब बेबस पिता उसके इलाज के लिए परेशान हो रहे हैं। उनका आरोप है कि एबी-पॉजीटिव ब्लड देने के बाद से ही रिएक्शन हुआ।
रानी उर्फ उमा पिता लखनलाल वर्मा निवासी पाटनीपुरा को तेज बुखार व पेट दर्द की शिकायत हुई थी। यशवंत निवास रोड स्थित निजी क्लिनिक में डॉक्टर से जांच करवाई। उसमें हिमोलैटिक एनीमिया बताया गया। 14 दिसंबर को उसे लक्ष्मी मेमोरियल अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। फिर ग्रेटर कैलाश अस्पताल में ब्लड ग्रुप व हिमोग्लोबिन (एचबी) की जांच करवाई। ब्लड गु्रप बी-पॉजीटिव निकला, जबकि एचबी केवल चार। इसी ग्रुप का दो यूनिट ब्लड चढ़ाया। वहां से डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन 27 दिसंबर को फिर तेज बुखार आया। पिता रानी को श्रीजी अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टर ने 28 दिसंबर को अरबिंदो हॉस्पिटल रैफर कर दिया। वहां डॉक्टरों ने ब्लड ग्रुप एबी-पॉजीटिव बताते हुए एक ही दिन में इस गु्रप की तीन यूनिट चढ़ाई, जबकि पिता ने बताया ब्लड ग्रुप बी-पॉजीटिव है। एबी-पॉजीटिव ब्लड देने के बाद रानी की छाती में दर्द, पैर में लालपन व अंगुलियां काली होने लगीं। रीना को डीआईसी (डिसेमीनेटेड इंट्रावैस्क्यूलर कोएग्युलेशन) होना बताया गया।
डॉक्टर ने परिजनों से कहा कि इसको केवल ओ-नेगेटिव ब्लड दिया जा सकता है, जो चढ़ा दिया है। 1 जनवरी तक रीना को एबी-पॉजीटिव, उसके एफएफपी, ओ-नेगेटिव और उसके पैक सेल चढ़ाए गए। वहां करीब एक लाख रु. खर्च हो गया। परिजन रानी को 4 जनवरी को एमवायएच लाए। यहां वार्ड 27 में डॉ. ए. डी. भटनागर की यूनिट में भर्ती किया। इस बीच रीना के हाथ में गैंगरीन हो गया और हाथ-पैर में सूजन भी आ गई। एमवायएच में जांच में पता चला कि ऑटो एग्लूटेशन ब्लड है। दोबारा जांच की, जिसमें ग्रुप बी-पॉजीटिव बताया गया। एमवाय से उसे दो दिन पहले डिस्चार्ज किया है। डिस्चार्ज टिकट पर लिखा गया कि ब्लड ट्रांसफ्यूजन में रिएक्शन हुआ है। मामले में फोरम फॉर पेशेंट राइट के सदस्य राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को शिकायत करेंगे।
ऐसे हुई गड़बड़ी
भास्कर ने इस बारे में शहर के वरिष्ठ पैथोलॉजिस्टों से बात की। उनके मुताबिक किसी मरीज को ब्लड देते समय यह ध्यान रखा जाता है कि रिवर्स ब्लड गू्रपिंग की गई या नहीं? ब्लड की क्रॉस मैचिंग और गू्रपिंग की जाती है। गू्रपिंग रिवर्स और फॉरवर्ड मैथड से की जाती है। इसमें पता लग जाता है कि ऑटो एग्लूटेशन हुआ है। इसके बाद दोबारा सेल वॉश कर ब्लड ग्रुप का पता लगाया जाता है। डॉक्टरों के अनुसार मरीज का एबी-पॉजीटिव ग्रुप आता है तो उनके ग्रुप की दोबारा जांच करते हैं क्योंकि उनमें ऑटो एग्लूटेशन की संभावना होती है। गड़बड़ी तभी होती है जब या तो एंटीसिरा की गुणवत्ता ठीक नहीं हो या सैंपल कलेक्शन में गड़बड़ी हुई हो।
हिमोलैटिक एनीमिया
यह खून की बीमारी होती है। इसमें ब्लड सेल यानी आरबीसी खुद-ब-खुद टूट जाते हैं। तीन महीने में अपने आप बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में ओ-नेगेटिव ब्लड ही दे सकते हैं
लड़की को जो बीमारी थी, उसमें ब्लड ग्रुप पता करना मुश्किल होता है। ऐसे में मरीज में कई एंटी बॉडीज बनने लगती हैं। ये आरबीसी के साथ चिपक जाती हैं। ऐसे में मरीज को ओ-नेगेटिव ग्रुप का ब्लड ही दे सकते हैं। हमने हेमेटोलॉजी विभाग और आरएमओ से भी बात की। रानी का ग्रुप एबी-पॉजीटिव ही था। उसको प्रॉब्लम पहले से थी। नोट्स दोबारा जांचें। हमारी लैब में ब्लड की क्रॉस मैचिंग और क्रोम्स टेस्ट भी किया गया, जो पॉजीटिव आया था।
- डॉ. बी. बी. गुप्ता, अरबिंदो मेडिकल कॉलेज में रानी का इलाज करने वाले
ऑटो एग्लूटेशन में ऐसी संभावना होती है
ऑटो एग्लूटेशन में एबी-पॉजीटिव ब्लड ग्रुप बताने की संभावना होती है। इमरजेंसी में बी-पॉजीटिव के रिसिपेंट को एबी-पॉजीटिव ब्लड दे सकते हैं, लेकिन ज्यादा नहीं। ऑटो एग्लूटेशन का पता जांच के दौरान ही चल जाता है।
- डॉ. अशोक यादव, ब्लड बैंक इंचार्ज एमवायएच
एक्सपर्ट ओपिनियन
ऐसे में नहीं दे सकते एबी-पॉजीटिव ब्लड
यदि ब्लड ग्रुप एबी पॉजीटिव आता है तो यह मानकर चलते हैं कि ऑटो एग्लूटेशन होगा, इसलिए एहतियात बरती जा सकती है। ऑटो एग्लूटेशन में ब्लड ग्रुप कुछ और होता है, लेकिन दिखाई देता है एबी-पॉजीटिव। बी-पॉजीटिव मरीज को एबी-पॉजीटिव ब्लड नहीं दे सकते।
- डॉ. नीलम भरिहोक, पैथोलॉजिस्ट बॉम्बे हॉस्पिटल
इस गलती के गंभीर दुष्परिणाम
एबी-पॉजीटिव ग्रुप वाले व्यक्ति को बी-पॉजीटिव ब्लड दिया जा सकता है, लेकिन बी-पॉजीटिव वाले को एबी-पॉजीटिव नहीं दिया जा सकता। ब्लड ट्रांसफ्यूजन में गलती के कारण कई गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हंै। गलत ब्लड देने की वजह से मरीज डीआईसी की स्थिति में भी पहुंच सकता है।
- डॉ. असीम तिवारी, ब्लड ट्रांसफ्यूजन स्पेशलिस्ट, मेदांता हॉस्पिटल गुडग़ांव
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