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‘द कन्वर्सेशन विद मिस्टिक’ में बोले गुरु सद्‌गुरु- भारत यानी भाव, राग और ताल

6 वर्ष पहले
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इंदौर. शहर के लिए शनिवार को यह अनूठा अवसर था जब ईशा फाउंडेशन के फाउंडर, आध्यात्मिक गुरु और जाने-माने योगी सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव लोगों से रूबरू हुए। दैनिक भास्कर द्व‌ारा आयोजित ‘द कन्वर्सेशन विद मिस्टिक’ कार्यक्रम में भास्कर के ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक ने उनसे प्रबुद्ध‌ श्रोताओं के समक्ष जीवन से जुड़े विषयों पर खुलकर सवाल किए।
सद्‌गुरु ने कहा कि भारत यानी भाव, राग और ताल। भ से भावनाएं। र से राग यानी लाइफ की ट्यूनिंग। त से ताल जिसे पकड़ लिया तो सब आनंदमयी। सद्‌गुरु के साथ यूं चला सवालों-जवाबों का सिलसिला-
"यह देखें कि गुरु आपके लिए सही है या नहीं...''
इस बात पर प्रकाश डालें कि आम आदमी सच्चे गुरु, पाखंडी बाबाओं में फर्क कैसे करे?
- भारत में आध्यात्मिक प्रक्रिया प्राचीन है। यह अपने ढंग से सत्य खोजने की प्रक्रिया है। हम निर्णय क्यों करें कि कौन सही है, कौन गलत। आप यह देखें कि गुरु आपके लिए सही है या नहीं। गर है तो ठीक, वरना कोई और विकल्प चुन लें। हम तो टेक्नोलॉजी ऑफ गॉड मेकिंग भी जानते हैं। यहां हर शख्स अपना भगवान बना लेता है। सिर्फ भारतीय संस्कृति आपको अपना भगवान चुनने की और बनाने की आज़ादी देती है।
दुनिया बदल गई, लेकिन संतों का रूप और पहनावा नहीं बदला। क्या वजह है?
- मैं भारतीय तरीके से रहने में विश्वास रखता हूं। मैं इन कपड़ों में कम्फर्टेबल भी हूं। अंग्रेज़ों ने हम पर 300 साल राज किया। हमारी मानसिकता में अाज भी वह सुपीरियर है। हम यह मानते रहे हैं कि पश्चिम से जो भी आया वह बेस्ट है। दुनिया भारत में बुना कपड़ा पहनना चाहती है। हालांकि यह कम्फर्ट का सवाल है और इसकी परिभाषा हर किसी के लिए अलग हो सकती है।
असल गुरु कैसे मिलेगा? हम उसे कैसे पहचानेंगे?
- गुरु को ढूंढने की ज़रूरत ही नहीं। असल सवाल यह है कि आप को अपने भीतर जाना होगा। गुरु शॉपिंग की जरूरत नहीं। आप अपने भीतर अपने को पा लेंगे तो गुरु खुद आपको ढूंढ लेगा।
यह भी कहा गुरु सदगुरु ने जीवन की लय पा ली तो सब पा लिया
भारत। हमारे देश का नाम अदभुत है। भ से भाव। इसका मतलब है सेंसेशन ऑफ लाइफ। हम जो देखते हैं, स्पर्श करते हैं, स्वाद लेते हैं। र यानी राग। राग यानी ट्यून होना, प्रकृति के साथ। यह सब सैट बॉय नेचर होता है। त यानी रिदम यानी लय। यदि हम अपने जीवन की लय पा लेते हैं तो सब कुछ आनंदमय हो जाता है।
फ्रैगरेंस ऑफ जैस्मिन
इस्तानबुल का एक 60 साल का बिशप एक गुरु से मिलने निकलता है। वह पहाड़ी चढ़ता हुआ एक गुफा में आंख बंद किए बैठे योगी से मिलता है। जब योगी आंख खोलते हैं तो बिशप पूछता है कि ज़िंदगी क्या है? वे कहते हैं ज़िंदगी फ्रैगरेंस ऑफ जैस्मीन है जो स्प्रिंग ब्रीज़ पर तैर रही है।
बिशप कहते हैं कि हमारे टीचर ने तो बताया कि ज़िंदगी एक कांटा है। यह आपके नज़रिये पर निर्भर करेगा कि ज़िंदगी क्या है। सदगुरु कहते हैं लेकिन यह सवाल तो 6 या 16 की उम्र में पूछा जाना चाहिए।
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