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डाउनलोड करेंइंदौर। आईआईएम इंदौर के चार प्रोफेसरों की याचिका पर हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आठ पक्षकारों को नोटिस जारी करने का फैसला सुनाया है। याचिका में प्रोफेसरों ने डायरेक्टर एन. रविचंद्रन पर वित्तीय, भर्ती संबंधी, प्रशासनिक व्यवस्था बिगाडऩे, एकेडमिक प्रोग्राम खराब करने, तानाशाही रवैये से काम करने और पीएचडी थीसिस की नकल करने जैसे गंभीर आरोप दोहराए हैं।
प्रोफेसरों ने मई 2012 में लगाई याचिका में कहा- डायरेक्टर के तानाशाही रवैये से संस्थान का एकेडमिक स्तर और इज्जत गिर गई है। सीबीआई जैसी स्वतंत्र संस्था से जांच करवाई जाना चाहिए। यह भी कहा है कि हाई कोर्ट के 28 मई 2012 के आदेश के बाद भी जांच को लेकर गंभीरता नहीं बरती गई। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जांच का जिम्मा खुद नहीं लेते हुए बोर्ड को दे दिया।
बोर्ड चेयरमैन के.वी. कामथ ने पांच सदस्यीय ऐसी जांच कमेटी बनाई, जिसमें तीन तो बोर्ड सदस्य थे और एक डायरेक्टर के करीबी मित्र। ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती थी और यही हुआ। डायरेक्टर को गंभीर आरोपों में क्लीन चिट दे दी गई और शिकायत करने वाले प्रोफेसरों को बयान के लिए भी नहीं बुलाया। बाद में याचिकाकर्ताओं को एकेडमिक व प्रशासनिक पदों से हटा दिया।
मंत्रालय और बोर्ड ने नियम तोड़ा- फैकल्टी ने जांच के दौरान डायरेक्टर को छुट्टी पर भेजने का निवेदन किया था। नियमानुसार किसी के खिलाफ जांच के दौरान व्यक्ति को पद पर नहीं रखा जाता, लेकिन मंत्रालय और बोर्ड ने ऐसा नहीं किया। जांच कमेटी को डायरेक्टर ने मनचाहे दस्तावेज दिए और जांच पूरी करवा दी।
महिला प्रोफेसर की हत्या से यौन शोषण तक
आईआईएम इंदौर ने बीते कुछ सालों में एकेडमिक मामलों के बजाय विवादों के कारण अधिक सुर्खियां बंटोरी हैं। कैम्पस में महिला प्रोफेसर की हत्या, ड्रग्स कांड से लेकर महिला प्रोफेसर के यौन शोषण तक की घटनाएं हुई हैं।
ञ्च दिसंबर 2010 में प्रोफेसर अमृता पंचोली की संस्थान के कैम्पस में स्थित घर में हत्या कर दी गई। हत्यारा नौकर
ही निकला।
ञ्च फरवरी 12 में छात्रों द्वारा कैम्पस में ड्रग्स लेने का मामला सामने आया। 2012 के अंत में फिर ड्रग्स कांड हुआ।
ञ्च आईआईएम ने 12वीं बाद के पांच वर्षीय डिप्लोमा कोर्स आईपीएम लांच किया, डिग्री का मुद्दा उठा तो डायरेक्टर ने छात्रों को कोर्स के साथ डिस्टेंस एजुकेशन से बैचलर डिग्री के लिए भी कह दिया।
ञ्च संस्थान के कुछ प्रोफेसरों ने फरवरी 2012 में तत्कालीन बोर्ड चेयरमैन एल.एन. झुनझुनवाला से डायरेक्टर के खराब व्यवहार व आर्थिक अनियमितता संबंधी शिकायत की।
ञ्च चेयरमैन और डायरेक्टर में मनमुटाव बढ़ा और अप्रैल 2012 में बोर्ड चेयरमैन ने डायरेक्टर पर दुव्र्यवहार का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया।
ञ्च सात प्रोफेसर डायरेक्टर के खिलाफ हाई कोर्ट गए और वहां से जांच का फैसला आया।
ञ्च 2012 में फूड पॉइजनिंग से 150 से अधिक छात्र बीमार हो गए।
ञ्च संस्थान ने एडुलाइव संस्था से समझौता किया, जिसने छात्रों से सीधे राशि अपने पास रख ली। संस्थान में स्थित कंपनी का दफ्तर सील किया गया।
ञ्च दो साल में करीब दस फैकल्टी ने संस्थान छोड़ दिया।
ञ्च फरवरी 2013 में महिला प्रोफेसर ने साथी प्रोफेसर द्वारा गोआ और बैंकॉक में यौन शोषण करने का आरोप लगाया। प्रोफेसर हाई कोर्ट भी गई।
ञ्च प्रोफेसरों की शिकायत पर हुई जांच में डायरेक्टर का व्यवहार खराब पाया गया, लेकिन क्लीन चिट दे दी, प्रोफेसर फिर हाई कोर्ट गए और 8 मई 2013 को आठ पक्षकारों को नोटिस जारी करने का फैसला हुआ।
याचिका में फिर उठी अंगुली
वित्तीय अनियमितता
> टेंडर प्रक्रिया किए बिना ही आर्किटेक्ट व प्रोजेक्ट कंसल्टेंट की नियुक्ति।
> कॉन्ट्रेक्टर को काम जांचे बिना ही भुगतान किया जाना।
> टेंडर प्रक्रिया बिना ही कॉन्ट्रेक्टर को आगे भी काम दिया जाना।
> बोर्ड से बिना मंजूरी के ही कॉन्ट्रेक्ट की लागत राशि बढ़ाना।
भर्ती में मनमानी
> मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नियमों को ताक पर रख भर्ती।
> कुछ फैकल्टी सदस्यों को नियम विरुद्ध उच्च वेतन देना।
> कुछ फैकल्टी के प्रोबेशन समय को घटा दिया गया, जो गलत है।
> अधिकारियों व स्टाफ की बिना नियमों के भर्ती।
> कुछ फैकल्टी सदस्यों को अतिरिक्त वेतन बढ़ोतरी देना।
प्रशासनिक व्यवस्था बिगाड़ी
> असिस्टेंट प्रोफेसर को डीन बनाना, जबकि कायदे से यह पोस्ट प्रोफेसर स्तर की है।
> प्रोफेसर को अन्य जिम्मेदारियों के साथ ही चीफ विजिलेंस ऑफिसर बनाना, जो नहीं हो सकता।
> वित्तीय विभाग से वरिष्ठ स्टाफ को हटाकर अपने लोगों को बैठाना।
> कमेटियों को बार-बार बनाना व भंग करना, बिना उनके काम पूरे किए।
> क्रय, शिकायत, शारीरिक शोषण व अन्य महत्वपूर्ण कमेटियों में जूनियर या बिना अनुभवी को पद।
एकेडमिक प्रोग्राम खराब
> कुछ कार्यक्रमों में प्रवेश प्रक्रिया का पालन नहीं होना व मानकों को निम्न स्तर का करना।
> शॉर्ट व लांग टर्म एकेडमिक प्रोग्रामों में जूनियर व कम अनुभवी को जिम्मेदारी देना।
हिटलरशाही शासन
> स्टाफ व फैकल्टी से गाली-गलौज व अपशब्दों का प्रयोग।
> कमेटी सदस्यों को उनके मुताबिक निर्णय लेने के लिए दबाव डालना।
> मीटिंगों के वास्तविक मिनिट्स रिकॉर्ड नहीं करना।
> भेदभावपूर्ण व्यवहार करना।
> पद्मनाभन जैसे कुछ खास दोस्तों को अनैतिक लाभ दिया जाता है, खामियाजा संस्थान भुगत रहा है।
शोध काम में चोरी
> डायरेक्टर द्वारा शोध पत्र मौलिक नहीं होकर अन्य जगह से लिए गए हैं।
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