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डाउनलोड करेंइंदौर. एक समय चंबल घाटी में खौफ का पर्याय रहे दस्यु सरदार मलखान सिंह का कहना है कि हम प्रभावशालियों के आतंक के खिलाफ बागी बने थे, डाकू नहीं। डाकू तो आज के दौर के नेता हैं, जो पैसे की दौड़ में आगे निकलने की होड़ में रहते हैं। वे कहते हैं फांसी और उम्रकैद जैसी सजा भी अपराधियों को अपराध करने से रोक नहीं पा रही, तो यह किसकी कमजोरी है? अब एक ही रास्ता बचा है- अपराधियों को चौराहे पर सरेराह उनके परिवार-रिश्तेदारों के सामने कोड़े मारकर दंडित किया जाए।
डेढ़ दशक से अधिक समय तक चंबल घाटी में आतंक मचाने के बाद मलखानसिंह ने 32 साल पहले आत्मसमर्पण कर दिया था। वे बुधवार को इंदौर में थे। ‘भास्कर’ से मुलाकात में उन्होंने कहा- उस वक्त चंबल घाटी में फैले आतंक को रोकने के लिए राजीव गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से कहा था कि मुझसे आत्मसमर्पण करवाएं। आज भी मलखान सिंह के ठाठ पहले जैसे ही हैं। हर समय इनके साथ दो बंदूकधारी रहते हैं। पहली नजर में देखने वाले लोग इन्हें देखकर ही डर जाते हैं।
जब अर्जुन सिंह ने मुझसे संपर्क किया तो मैंने उनसे यही कहा था कि भिंड जिले के गांव बिलाव में मंदिर की सौ बीघा जमीन प्रभावशालियों ने हड़प ली है। यही बगावत का कारण है। जमीन लेकर रहेंगे तब तक आत्मसमर्पण का नाम तक मत लेना। अर्जुन सिंह ने जमीन दिलवा दी तो 17 जून 1982 को समर्पण कर दिया। आज वहां ट्रस्ट द्वारा मंदिर व सार्वजनिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
आगे की स्लाइड्स में पढ़ें इनके ठाठ के बारे में-
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