पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

नगर निगम चुनाव: आज हो सकता है इंदौर का फैसला, हाई कोर्ट का फैसला संभव

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
इंदौर. इंदौर नगर निगम चुनाव घोषित शेड्यूल के अनुसार होंगे या नहीं, इसको लेकर शुक्रवार शाम साढ़े चार बजे तक स्थिति साफ होने की संभावना है। शहरी सीमा में 29 गांव जोड़कर वार्डों की संख्या 85 करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर हाई कोर्ट का फैसला आ सकता है। कोर्ट इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुन चुकी है। कोर्ट के रुख पर भाजपा, कांग्रेस दोनों दलों के साथ ही सरकार, प्रशासन और राज्य निर्वाचन आयोग की भी निगाहें टिकी हुई हैं।
नगर निगम की सीमा बढ़ाकर वार्डों की संख्या 69 से 85 करने के राज्य सरकार के नोटिफिकेशन को एडवोकेट अनिल त्रिवेदी ने जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इसके लिए प्रकिया का पालन नहीं हुआ है। इसी पर फैसला आना है। गौरतलब है हाई कोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर पिछले दिनों इसी तरह के मामले में छिंदवाड़ा, जबलपुर और भोपाल का नोटिफिकेशन खारिज कर चुकी है।
जबलपुर के मामले में शासन ने रीव्यू पिटिशन भी लगाई थी जो खारिज हो चुकी है। इससे पहले हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ सारंगपुर का नोटिफिकेशन भी खारिज कर चुकी है। इन चारों स्थानों पर नगरीय निकाय के चुनाव फिलहाल नहीं हो रहे हैं। इसी वजह से इंदौर के मामले पर भी सभी की नजर है।
ये तीन विकल्प हैं
1. यदि नोटिफिकेशन खारिज हो गया तो...
नगर निगम चुनाव भी खटाई में पड़ जाएंगे, क्योंकि 29 गांव शहर सीमा से अलग होकर वापस 69 वार्ड हो जाएंगे, जबकि वार्डों का परिसीमन व आरक्षण 85 हो चुका है और चुनाव प्रक्रिया भी 85 वार्डों के हिसाब से ही शुरू हुई है। एडवोकेट अंशुमान श्रीवास्तव के मुताबिक कोर्ट में केवल नोटिफिकेशन पर बात हो रही है। चुनाव का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। कोर्ट भी केवल नोटिफिकेशन के संबंध में ही फैसला देगी, इसलिए यह ठोस तर्क नहीं होगा कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद प्रक्रिया नहीं रोकी जाती। वैसे भी यह चुनाव को लेकर याचिका नहीं है। अगर नोटिफिकेशन खारिज हुआ तो चुनाव के संबंध में फैसला चुनाव आयोग को लेना है। हालांकि यह साफ है कि जब नए वार्ड ही अस्तित्व में नहीं होंगे तो चुनाव भी नहीं हो सकते।
2. जनहित याचिका खारिज हो जाती है तो ...
नगर निगम चुनाव पर कोई असर नहीं होगा। 85 वार्ड के हिसाब से चुनाव होंगे।
3. अगर फैसले को लेकर जजों में मतभिन्नता हुई तो
हाई कोर्ट की डिविजन बेंच के जजों के बीच फैसले को लेकर मतभिन्नता हुई तो भी चुनाव पर कोई असर नहीं होगा। ऐसे में मामला चीफ जस्टिस के पास पहुंचेगा, आगे की कार्यवाही वे ही तय करेंगे।
सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देगी
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के महाधिवक्ता की ओर लिखित तर्क कोर्ट में पेश किया जाएगा। इसमें उल्लेख रहेगा कि सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच यह फैसला दे चुकी है कि राज्यपाल की आज्ञा से ही शासन सभी तरह के नोटिफिकेशन जारी करता है।
शहर सीमा विस्तार का नोटिफिकेशन भी इसी तरह का है। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था नोटिफिकेशन की प्रक्रिया में राज्यपाल को आपत्तियों का निराकरण करना चाहिए था। इसके बाद ही नोटिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू होना थी।