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डाउनलोड करेंइंदौर। 23 एकड़ के फलबाग को सरकार निजी हाथों में सौंप रही है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत यह किया जा रहा है। इस फैसले के साथ ही फलबाग निजी जागीर बन जाएगा। सरकार के हाथ में रहेगी केवल एग्रीमेंट की शर्तें।
हालांकि दावा किया जा रहा है कि शर्तों का उल्लंघन हुआ तो एग्रीमेंट खत्म कर दिया जाएगा। यह भी कि निजी हाथों में सौंपकर यहां अच्छा मनोरंजन स्थल बनाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार फलबाग की कीमत करीब 100 करोड़ रुपए है। निजी क्षेत्र यहां लगभग पांच करोड़ रुपए निवेश करेगा।
सरकार का कहना है कि जिस उद्यानिकी विभाग के पास फलबाग है उसका बजट नाममात्र का रहता है। जितने पैसे फलबाग को मिलते हैं उतने में रखरखाव नहीं हो पाता। सरकार ने घाटे वाली नर्सरियों को पीपीपी मॉडल पर चलाना तय किया है। इसी के चलते फलबाग निजी हाथों में दिया जा रहा है।
अब यह चाहती है सरकार- उद्यानिकी विभाग के आयुक्त अनुराग श्रीवास्तव के मुताबिक पीपीपी मॉडल पर फलबाग, वॉकिंग ट्रैक, बैंच, गॉर्डन, मॉर्डन हट लगाए जाएंगे। प्राइवेट फर्म को पौधे, फल बेचने का काम भी देंगे। फलबाग का मैनेजमेंट निजी फर्म करेगी। इस काम में सरकार भी पैसा लगाएगी। यदि शर्तों का उल्लंघन होता है तो एग्रीमेंट निरस्त कर दिया जाएगा।
घाटे के नाम पर 23 एकड़ में फैले हरे-भरे बाग से पल्ला झाड़ रही सरकार
ऐसा है फलबाग
इतने पेड़ - 350 आम के पेड़ हैं, 250 जाम के पेड़ थे। 70 फालसा, 27 चीकू, 12 जामुन और 12 शहतूत के पेड़ हैं।
नीलामी से होता मेंटेनेंस- हर साल आम और जाम के फलों की नीलामी की जाती है। इसी से नर्सरी का मेंटेनेंस होता है।
चुन-चुनकर लाए थे जाम- महाराजा यशवंत राव होलकर ने देश के अलग-अलग हिस्सों से आम व जाम के पौधे लाकर फलबाग में लगाए थे। यहां का बेदाना जाम मशहूर था। एप्पल गोवा (सेवफल जैसा लाल जाम) वे आगरा से लेकर आए थे।
आम की किस्में- हापुस, तोतापरी, बादाम, मालवी, लंगड़ा, कट्ठीवाड़ा। 500 किलो से ज्यादा आम हर साल लगते हैं।
यह है अंतर कस्तूरबा ग्राम नर्सरी और फलबाग में
कस्तूरबा- सौ एकड़ में सौ से ज्यादा मजदूर। गुणवत्ता जांची जाती है।
: किसी भी पेड़ के फलों की नीलामी नहीं की जाती। कर्मचारी ही खेरची और थोक भाव में फल बेचते हैं। नर्सरी लाभ में चल रही है।
फलबाग- 23 एकड़ में 50 मजदूर, देखरेख के लिए एक अफसर। चौकीदार भी एक ।
: आम की नीलामी में अधिकतम ३ लाख रु. आते हैं। रखरखाव पर ७ लाख खर्च होते हैं। 10 साल से एक ही कांट्रेक्टर को ठेका ।
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