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वह नौ महीने से डायलिसिस पर थी, आखिर भाई ने बचा ली जान

9 वर्ष पहले
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इंदौर । पत्नी, मां, बहन, मौसी या बुआ द्वारा मरीज को किडनी देने के मामले अकसर सामने आते हैं लेकिन ऐसा कम ही होता है जब परिवार का कोई पुरुष महिला को किडनी दे। ऐसेे ही एक मामले में इंदौर के एक निजी अस्पताल में भाई ने छोटी बहन को किडनी देकर उसकी जान बचाई।

बैतूल जिले की द्वारकाबाई ठाकुर (45) पांच साल से किडनी की बीमारी से जूझ रही थीं। नौ महीने से डायलिसिस पर थीं। वह दो छोटे बच्चों की मां है। मुश्किल यह थी किडनी कौन दे? पति भीमसिंग (शिक्षक) किडनी देना चाहते थे लेकिन ब्लड ग्रुप नहीं मिला।

मुल्ताई में रहने वाले बड़े भाई जगबीर सिंह रघुवंशी (51) को बीमारी बताई तो वे बोले कि चिंता मत कर, मैं दूंगा किडनी। सिनर्जी अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण किया गया। दोनों के बीच खून का रिश्ता होने से ऑर्गन ट्रांसप्लांट बोर्ड ने तत्काल मंजूरी भी दे दी। नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. संदीप सक्सेना ने बताया कि डनीदाता और मरीज ठीक है। रघुवंशी को डिस्चार्ज कर दिया है जबकि द्वारकाबाई अस्पताल में हंै। मरीज का ब्लड ग्रुप 'एÓ था और किडनीदाता का 'ओÓ था। 'ओÓ ग्रुप का व्यक्ति किसी भी ग्रुप के व्यक्ति को किडनी दे सकता है।

20 फीसदी पुरुष ही देते हैं किडनी
शहर में किडनी ट्रांसप्लांट की संख्या तेजी से बढऩे लगी है लेकिन किडनीदाता में महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है। वरिष्ठ किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश पाहवा बताते हैं कि 80 से 90 फीसदी महिलाएं किडनी दान करती हैं, जबकि 10 से 20 फीसदी ही पुरुष दान करते हैं। इसके पीछे परिवार का तर्क होता है कि पुरुष पर कमाने की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में कभी उसे कुछ हो जाए तो?

इन अस्पतालों में होता है प्रत्यारोपण :चोइथराम, ग्रेटर कैलाश, बॉम्बे हॉस्पिटल, सिनर्जी