इंदौर. शहरी सीमा में शामिल किए गए गांवों के मामले में नगर निगम ने हाई कोर्ट में स्वीकार कि सर्वे किए बगैर 23 ग्राम पंचायतों के कुल 29 गांव शामिल कर लिए हैं। सर्वे इसलिए नहीं किया कि इस में जनता का पैसा बर्बाद होता। नगर निगम को पता था कि इन गांवों की क्या स्थिति है, इसलिए इन्हें शामिल कर लिया।
जस्टिस
पीके जायसवाल, जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की डिविजन बेंच के समक्ष गुरुवार को याचिकाकर्ता अनिल त्रिवेदी ने करीब एक घंटा दलील दी। त्रिवेदी ने कहा कि 29 गांव शामिल करने के पीछे तर्क दिया है कि इससे शहरी जनता को पानी, ड्रेनेज, सफाई इत्यादि की सुविधा मिलेगी। जिन गांवों को शामिल किया है वहां पर गंदी बस्ती और अव्यवस्थित बसाहट आकार ले रही है। शहर के मास्टर प्लान में ही यह बताया गया कि शहर में एक दशक से 492 गंदी बस्ती हैं, जिनका अब तक कुछ नहीं हुआ है।
कोर्ट को यह भी बताया कि जिन ग्राम पंचायतों को शामिल किया है वह संविधान के अनुसार स्थापित हैं। इनका कार्यकाल अभी चल रहा है। इन पंचायतों से कोई ठहराव, प्रस्ताव या सहमित तक नहीं ली गई। यहां के लोगों का मत नहीं लिया गया कि शहर में शामिल होना चाहते हैं या नहीं? एक ग्राम पंचायत और राज्य शासन में कोई अंतर नहीं होता।
राज्य शासन पूरा प्रदेश गवर्न करता है जबकि पंचायत केवल एक गांव। जिस तरह किसी राज्य का अन्य राज्य में विलय नहीं किया जा सकता, ठीक वैसे ही ग्राम पंचायतों को भी इतनी आसानी से शहर में शामिल नहीं किया जा सकता। शासन का पक्ष अब 1 अक्टूबर को प्रदेश के महाधिवक्ता आरडी जैन रखने आएंगे।
हो सकते हैं चुनाव प्रभावित
अगर 29 गांव का नोटिफिकेशन खारिज हुआ तो नगर निगम चुनाव पर इसका सीधा-सीधा असर होगा। नया वार्ड परिसीमन 29 गांवों को शामिल कर बनाया गया है। वार्डों की संख्या भी शहरी सीमा बढ़ने के बाद 81 हो गई है। ऐसी सूरत में शासन, प्रशासन को नए सिरे से कवायद शुरू करना होगी। छह महीने से ज्यादा वक्त तक चुनाव टल सकते हैं।
आधा दर्जन निगम अधिकारी आए
सुनवाई के दौरान नगर निगम के आधा दर्जन अधिकारी मौजूद थे। निगमायुक्त राकेश सिंह बुधवार को फटकार के बाद स्वत: वकीलों के पीछे जाकर खड़े गए थे। सचिव अभय राजनगांवकर, सिटी इंजीनियर
हरभजन सिंह, विधि अधिकारी भूरेलाल कासट के अलावा एक उपायुक्त और इंजीनियर भी कोर्ट रूम में उपस्थित थे।
हर बार खाई मात, नहीं दे पाए सही जवाब
निगम 29 गांवों के मामले में दो याचिकाओं में एक साथ जवाब देने में पूरी तरह उलझ गया है। एक मामला है 90 गांवों को शामिल करने का है। इसे लेकर याचिका किशोर कोडवानी ने लगाई है। बुधवार को इस पर सुनवाई भी हुई। दूसरी याचिका त्रिवेदी की है, जिसमें गांवों को शामिल करने की प्रक्रिया को ही चुनौती दी गई है। निगम पिछली कई सुनवाई से इसमें उलझा हुआ है।
कोर्ट में पहले दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन भी उसके वकील नहीं करवा पाए। इसी कारण अफसर भी आलोचना के शिकार हुए। कभी आंकड़ों के हेरफेर तो कभी सर्वे में मामला उलझा। अफसरों को भी उम्मीद नहीं थी कि सर्वे का मामला इस तरह तूल पकड़ लेगा।