जबलपुर। चिकित्सकों के द्वारा नौकरी छोड़ने का सिलसिला अभी भी जारी है। आज मेडिकल टीचर एसोसिएशन के सदस्यों और पदाधिकारियों ने चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री शरद जैन को अपनी समस्या बताई और उनका समाधान करने के लिए जल्द कदम उठाने का आग्रह किया।
टीचर एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंडल ने भंवरताल के करीब एक कार्यक्रम में चिकित्सा शिक्षा मंत्री से कहा कि मेडिकल कॉलेज में स्वशासी सेवा दे रहे चिकित्सक भारी समस्याओं से जूझ रहे हैं। किसी भी प्रकार की सुविधाओं का लाभ चिकित्सकों को नहीं मिल पा रहा है। लगातार इस वजह से चिकित्सक नौकरी भी छोड़ रहे हैं।
चिकित्सक मेडिकल में नौकरी करने की बजाए प्राइवेट प्रैक्टिस को महत्व देते हैं, क्योंकि वहां मेहनत से कुछ भविष्य संवर भी सकता है । सरकारी सेवा में रहते हुए भी उन्हें सेवा के बदले कुछ भी नहीं मिलता। प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि उन्हें शासन के स्पष्ट आदेश के बाद भी अभी तक अंशदायी पेंशन योजना न्यू पेंशन स्कीम का लाभ नहीं मिला है। प्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग में यह योजना लागू है, लेकिन चिकित्सा शिक्षा विभाग में इसे लागू करने निर्णय नहीं हुआ। इस संबंध में स्वशासी चिकित्सकों ने कॉलेज अधिष्ठाता एवं प्रमुख सचिव को अवगत कराया, पर कुछ नहीं हाे सका।
हमारी भी सुने सरकार
सभी की समस्याओं का समाधान होता है तो चिकित्सकों की भी समस्याओं का समाधान होना चाहिए। आटोनॉमस में सेवा दे रहे काॅलेज अस्पताल के 240 से अधिक चिकित्सक कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। अंशदायी पेंशन योजना, चिकित्सीय भत्ता, समय पर वेतन आदि अनेक विसंगति हैं, जिनका हल िनकाला जाना जरूरी है। हमने मंत्री जी से मिलकर अपनी परेशानी बताई है।
-डॉ आशुतोष सालोदिया, सचिव मेडिकल टीचर एसाे.
दो माह से वेतन के लाले
टीचर एसोसिएशन के सदस्यों ने यह भी बताया कि उन्हें दिसम्बर माह से वेतन अभी तक नहीं मिला है। चिकित्सकों को वेतन नहीं िमलने से उनके ऊपर िवत्तीय एवं मानसिक दबाव बना हुआ है। वेतन की समस्या का स्थाई समाधान िनकाला जाना जरूरी है। साथ ही अंशदायी पेंशन योजना जो 2005 से लागू है उसको लागू किया जाना जरूरी है। जो चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं वे फिर भी इस तरह के आर्थिक अभाव में गुजारा वैकल्पिक प्रबंध द्वारा कर सकते हैं, लेकिन जो केवल वेतन पर निर्भर हैं उनके सामने आज बड़ा आर्थिक संकट है।
पर हमें लाभ नहीं
मेडिकल टीचर एसाेसिएशन के सदस्यों ने कहा कि हमारे हस्ताक्षर से बड़े-बड़े मेडिकल बिल तो पास हो जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि हमें ही किसी भी प्रकार का चिकित्सीय भत्ता नहीं मिलता है। वर्ष 1998 के बाद से आज तक सेवाओं में सुधार नहीं हो पाया है। पिछले तीन साल में 4 चिकित्सकों को कैंसर हुआ, इसमें लाखों रूपए इलाज में लगे, लेकिन मेडिकल काॅलेज से मदद नहीं मिल सकी।