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एक आईएलएस ने हजारों को डाला फजीहत में, साल भर से सैकड़ों उड़ानें हो रहीं प्रभावित

6 वर्ष पहले
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जबलपुर। एविएशन सेक्टर में मौसम की अड़ंगेबाजी कोई नहीं बात नहीं, साल भर के कई दिनों में ऐसे हालात बनते रहे हैं, जब विजीविलिटी कम होने की वजह से लैड़िंग संभव न हो पाई हो। इंस्ट्रूमेंटल लैड़िंग सिस्टम (आई एलएस) मौसम की वजह से आने वाली इस परेशानी का कारगर हल है, लेकिन डुमना एयरपोर्ट पर इस सुविधा के लिए वर्षों से इंतजार ही बना हुआ है। हालांकि इसके लिए डुमना प्रबंधन ने कुछ समय पहले प्रयास भी किए, लेकिन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया। हमेशा की तरह ही स्थानीय तौर पर कोई प्रयास भी नहीं किए गए।

रायपुर व इंदौर से पीछे
एयरपोर्ट के आधुनिकीकरण की बात तो छोड़िए, बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी डुमना काफी पीछे है। जानकारों का कहना है कि रायपुर, इंदौर जैसे शहर के विमानतल आई एलएस के साथ अन्य जरूरी उपकरणों से सुसज्जित हैं। पता चला है कि कुछ अन्य विमानतलों में आई एलएस सुविधा देने की तैयारियां चल रही हैं, लेकिन इनमें जबलपुर का नाम दूर-दूर तक नहीं है। सिर्फ अपग्रेडेशन के समय यह उपकरण डुमना में लगाया जाएगा, यह भरोसा दिलाया गया है।
मौसम ने बिगाड़ा शैड्यूल
नए साल में विमान सेवाओं ने फ्लायर्स को तगड़ा झटका दिया। पहली तारीख से लेेकर 3 जनवरी तक फ्लाइट आई ही नहीं। इसके बाद 23, 24 और फिर 27 तथा 28 को स्पाइस जेट की विमान सेवा कैंसल रही। इससे दिल्ली-जबलपुर, जबलुपर-मुंबई और फिर मुंबई-जबलपुर, जबलपुर- दिल्ली की उड़ान संभव नहीं हो पाई। फ्लायर्स परेशान होते रह गए।
हाई विजिबिलिटी जरूरी नहीं
आई एलएस होने पर एटीसी और पायलट एक फ्रीक्वेंसी पर होते हैं। आई एलएस पूरी से इंस्ट्रूमेंट िमट्रोलॉजिकल कंडीशन (आईएमसी) पैटर्न पर काम करता है और रेडियो बीम ट्रांसमीटर इसका सबसे अहम उपकरण है। जानकारों का कहना है कि इस तकनीक से पायलट के सामने स्क्रीन पर पूरा चार्ट तैयार हो जाता है। जिसमें िवजीविलिटी, फॉग डेनसिटी के साथ फ्लाइट लोकेशन को दर्शाता है। इलेक्ट्रॉनिक मैप में लैड़िंग स्पीड, लैड़िंग एंगल जैसे आंकड़ों की भी जानकारी रहती है। कुल मिलाकर बाहरी परिस्थितियों का सीधे तौर पर जायजा लेने की जरूरत नहीं होती।
मौजूदा दौर में सामान्य ट्रैफिक वाले एयरपोर्ट के लिए भी आई एलएस जरूरी होता जा रहा है। इधर डुमना में भरपूर फ्लायर्स की मौजूदगी के बाद भी अपग्रेडेशन के नाम पर कुछ है ही नहीं। मौसम की खराबी वाले दिनों में फ्लायर्स विमान का इंतजार ही करते रह जाते हैं, ऐन वक्त पर पता चलता है कि लैड़िंग संभव न हो पाने के कारण उड़ान रद्द की जा रही है।
ऐसे काम करता है आई एलएस-बॉक्स
इंस्ट्रूमेंटल लैड़िंग सिस्टम पूरी तरह से रेडियो तरंगों पर काम करने वाला उपकरण है। सामान्य तौर पर लैड़िंग के लिये एयर ट्रैफिक कंट्रोल और पायलट के बीच संपर्क बना रहता है। दृश्यता दोनों के लिए ही बेहद अहम रहती है। रनवे की स्थिति और विमान की लोकेशन संबंधी जानकारी पायलट को मुहैया कराने में एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) मदद करता है। साथ ही पायलट भी िवजीविलिटी के आधार पर रनवे के हिसाब से अपनी उड़ान और स्थिति को नियंत्रित करता है। सोचने वाली बात है कि घने कोहरे, धुंध जैसी स्थिति में न तो एटीसी के सामने तस्वीर साफ होती है और न ही पायलट की स्क्रीन के आगे।