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कोर्ट ने दिया आश्वासन, 'अब आरोपियों से नहीं होगी अभद्रता'

7 वर्ष पहले
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जबलपुर. अधिवता पर हुए प्राणघातक हमले के मामले में हाईकोर्ट बार के शीर्ष पदाधिकारियों ने आश्वासन दिया है
कि अब आरोपियों के साथ किसी भी प्रकार की कोई अभद्रता नहीं होगी। अब वकील आरोपियों के ओर से पैरवी के लिए
इनकार भी नहीं करेंगे। इन बयानों को सुनकर जस्टिस एनके गुह्रश्वता की एकलपीठ ने आरोपियों की उस याचिका का निराकरण कर दिया, जिसमें पैरवी के लिए वकील न मिलने के कारण मुकदमा किसी और जिले में स्थानांतरित किए जाने की प्रार्थना की गई थी।

उल्लेखनीय है कि 30 अप्रैल 2013 को अधिवता मुकुन्द पाण्डेय और उसके साथियों पर महाराजपुर में प्राणघातक हमला हुआ था। अधारताल पुलिस ने इस मामले को दर्ज करके कई आरोपियों को गिरतार किया था। मामले के
आरोपी प्रदीप साहू, दालचंद साहू और विवेक साहू ने हाईकोर्ट की ओर से यह पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई थी। उनका कहना था कि निचली अदालत में चल रहे मुकदमे में उनका पक्ष रखने कोई वकील तैयार नहीं हो रहा।
अधिवता श्याम विश्वकर्मा तैयार हुए तो उन पर स्याही फेंकी गई। इन आधारों के साथ जिला सत्र न्यायालय में चल रहे प्रकरण को किसी और जिले में स्थानांतरित किए जाने की प्रार्थना याचिका में की गई थी।

मामले पर सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान आवेदकों की ओर से अधिवता उमेश त्रिपाठी, राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवता अजय ताम्रकार और आपत्तिकर्ता मुकुन्द पाण्डेय की ओर से अधिवता पंकज तिवारी हाजिर हुए। सुनवाई के दौरान अदालत ने अधिवता श्याम विश्वकर्मा को बुलाकर उनका पक्ष सुना। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी और सचिव मनीष तिवारी भी हाजिर रहे। उन्होंने कोर्ट में आश्वासन दिया कि आरोपियों या उनके अधिवता के साथ अभद्रता जैसी घटना की पुनरावृत्ति अब नहीं होगी। श्री तिवारी ने यह भी कहा कि यदि निचली अदालत में चल रही ट्रायल के लिए कोई आरोपी चाहे तो वे उसकी ओर से पैरवी भी कर सकते हैं। बार के शीर्ष पदाधिकारियों के बयान को सुनकर अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपियों के साथ अब दोबारा ऐसी घटना होती है, तो वे मुकदमे के ट्रांसफर को लेकर नई याचिका दायर कर सकते हैं। इसी तरह जस्टिस गुह्रश्वता ने निचली अदालत को भी निर्देश दिए कि आरोपियों को 15 दिन का समय भी दिया जाए, ताकि वे अपनी पसंद के अधिवता पैरवी के लिए नियुत कर सकें।

एफआईआर निरस्त करने से इनकार- वहीं इसी मामले की एफआईआर निरस्त किए जाने को लेकर दायर एक अन्य याचिका जस्टिस आलोक अराधे की एकलपीठ ने निरस्त कर दी है। अपने आदेश में जस्टिस अराधे ने कहा है कि निचली अदालत में आरोप तय होने के बाद एफआईआर निरस्त नहीं की जा सकती। हालांकि अदालत ने कहा है कि अधारताल थाने में दर्ज एफआईआर को लेकर आरोपियों ने जो अयावेदन पुलिस अधीक्षक को 4 मई 2013 को दिया था, वे उस पर विधि अनुसार कार्रवाई करें। सुनवाई के दौरान आपत्तिकर्ता मुकुन्द पाण्डे की ओर से वरिष्ठ अधिवता आदर्शमुनि त्रिवेदी ने अदालत को बताया कि निचली अदालत में सभी आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 307 के तहत आरोप तय हो चुके हैं। ऐसे में याचिकाकर्ताओं द्वारा चाही गई राहत उन्हें नहीं दी जा सकती।

...यों निरस्त की परीक्षा नियंत्रक की नियुत्ति?- चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने राज्य सरकार व अन्य से पूछा है कि रानी दुर्गावती विवि में परीक्षा नियंत्रक के पद पर नियुत्तियां निरस्त कर दी गई? युगलपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अनावेदकों को दो सह्रश्वताह में जवाब पेश करने कहा। मामले पर अगली सुनवाई 12 फरवरी को होगी। यह याचिका जबलपुर के रमाकांत तिवारी की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवता राजेन्द्र मिश्रा ने पक्ष रखा।