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सबसे पहले दो भाई यहां करते हैं देवी की पूजा, आज तक देख नहीं सका कोई इन्हें

इनमें से सबसे प्रसिद्ध है मां दुर्गा का शारदीय रूप श्रद्धेय देवी मैहर माता मंदिर जो समस्त भारत में अकेला मंदिर है

Danik Bhaskar | Oct 03, 2013, 12:00 AM IST
जबलपुर. 5 अक्टूबर से नवरात्र प्रारम्भ हो रहा है। इस अवसर पर dainikbhaskar.com ‘शक्ति की आराधना’ सीरीज के अंतगर्त बता रहा है एक ऐसे माता के मंदिर के बारे में जहां माना जाता है कि आज भी दो भाई यहां रोजाना दर्शन के लिए आते हैं, जिन्होंने कभी माता से अमरत्व का वरदान लिया था। स्थानिय लोगों का कहना है कि उन्हें किसी ने देखा नहीं है लेकिन आज भी सबसे पहले वही माता के मंदिर में पहुंचते हैं और देवी की पूजा-अर्चना करते हैं।
नवरात्र के दौरान यहां लगभग पूरे देश से भक्तों का यहां आना होता है। मान्यताओं के अनुसार अल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वो भी शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। इन दोनों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी। इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था।
आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारा करता था और तभी से ये मंदिर भी माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। यही नहीं तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे।
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पुराणों में 52 शक्तिपीठों की चर्चा है। हालांकि सतना के मैहर मंदिर का इसमें जिक्र नहीं है। फिर भी लोगों की आस्था इतनी अडिग है कि यहां सालों पर माता के दर्शन के लिए भक्तों का रेला लगा रहता है। उत्तर में जैसे लोग मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए वैष्णव देवी तक पहुंचते हैं, उसी तरह मध्यप्रदेश के सतना जिले में भी मां दुर्गा के शारदीय रूप मां शारदा का आशीर्वाद हासिल करने के लिए 1063 सीढ़ियां लांघ जाते हैं। सतना के इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर कहा जाता है। मैहर का मतलब है, मां का हार। 
 
 
मान्यता के अनुसार जब सती बिन बुलाए अपने पिता के घर गई और वहां पर राजा दक्ष के द्वारा अपने पति का अपमान सह न सकने पर उन्होंने अपनी काया को अपने ही तेज से भस्म कर दिया। भगवान शंकर यह शोक सह नहीं पाए और उनका तीसरा नेत्र खुल गया। जिससे तबाही मच गई। भगवान शंकर ने माता सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठा लिया और क्रोध में तांडव करने लगे। जब भगवान का क्रोध किसी प्रकार भी शांत न हुआ तो श्री विष्णु ने सती के अंगों को बावन भागों में बांट दिया।
 
 
जहां-जहां सती के अंग और आभूषण गिरे, वहां-वहां पर शक्ति पीठों की स्थापना हो गई। मैहर का अर्थ है मां का हार और यहां मां सती का हार गिरा था। तभी से यह पावन स्थान तीर्थ के रूप में जाना जाने लगा। मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। पर्वत की चोटी के मध्य में ही शादरा माता का मंदिर स्थापित है। पूरे भारत में सतना का मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है। 
 
 
विंध्य के पठार पर स्थित मध्य प्रदेश का सतना जिला 7500 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। खूबसूरत वनों और पहाडिय़ों के झुरमुट में बसा यह स्थान अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों से घिरा है। चित्रकूट,शारदा देवी का मंदिर, आल्हा ऊदल का अखाड़ा, माँ शारदा का मंदिर और मैहर सतना यहां के लोकप्रिय दर्शनीय स्थल हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध है मां दुर्गा का शारदीय रूप श्रद्धेय देवी मैहर माता मंदिर जो समस्त भारत में अकेला मंदिर है जो लगभग 600 फुट की ऊंचाई वाली त्रिकुटा पहाड़ी पर मैहर शहर में बसा है, मां के दर्शनों के लिए 1063 सीढिय़ों का मार्ग पार करना पड़ता है। 
 
 
यहां मंदिर में नारियल फोडऩे पर प्रतिबंध लगा दिया गया हैं। यहां बलि देने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही थी। जिस पर 1922 ई. में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने प्रतिबंध लगा दिया। मैहर घूमने का अच्छा समय नवरात्र है। यहां काफी भीड़ होती है। 
यहां से कटनी जाने के लिए बस मार्ग से जाया जा सकता है। जबलपुर निकटस्थ वायुमार्ग हैं। जिससे यात्री आसानी से पहुंच सकते हैं। मैहर रेलवे स्टेशन कटनी और सतना स्टेशनों के बीच में स्थित है और दोनों प्रमुख रेलमार्गों से जुड़ा हुआ है।