जिन्दगी का सफर कितना ही लम्बा हो, सात समंदर नापते हुए वर्षों बीते हों, कितनी ही अमीरी में दिन गुजरे हों, मखमली बिस्तरों पर रातें गुजरी हों, पर जब जिन्दगी की शाम आती है और सांसों पर अंधकार छा जाता है तब इस सफर का अंत श्मशानघाट में ही होता है और वहां मखमली नहीं लकड़ियों का बिस्तर होता है, वह भी अाखिरी बिस्तर। अब यदि यह आखिरी बिस्तर भी कष्ट देने लगे तो दु:ख और परेशानी होती ही होगी।
जबलपुर. चौंकाने वाली बात तो यह है कि हर इंसान जानता है कि उसके भी सफर का अंत होगा और उसे भी वही बिस्तर मिलेगा, फिर भी श्मशानघाटों के साथ लगातार अन्याय किया जा रहा है और यह प्रक्रिया वर्षों से चल रही है। करियापाथर श्मशानघाट में वर्षों से एक एेसा कमरा नहीं बन पाया, जहां लकड़ियां रखी जा सकें।
गीली लकड़ियों से ही अंतिम संस्कार हो रहे हैं, जिससे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया काफी लम्बी हो जाती है। नगर निगम पिछले कई सालों से मौत से मजाक कर रहा है। श्मशानघाटों में जो व्यवस्थाएं होनी चाहिए, वे नहीं मिल पा रही हैं। करियापाथर श्मशानघाट में पिछले कुछ सालों के अंदर लगभग एक करोड़ रुपए खर्च किए गए, पर इसके कोई खास नतीजे नहीं मिल पा रहे हैं।
हालात ये हैं कि यहां लकड़ियां तक बाहर रखी जाती हैं और बारिश के इस मौसम में जब गीली लकड़ियां मिलती हैं तो चिता को जलाने में ही घंटों लग जाते हैं। श्मशानघाटों में जब अंतिम संस्कार होता है तो शहर के नेता और अन्य व्हीआईपी भी वहां पहुंचते हैं और मौके पर ही विकास के कई वादे करते हैं, पर घर पहुंचकर नहाते हैं तो सारे वादे मैल की तरह धो डालते हैं।
दूसरा सबसे व्यस्त श्मशानघाट- करियापाथर ग्वारीघाट श्मशानघाट के बाद सबसे व्यस्त श्मशानघाट है। यहां रोजाना औसतन 4 से 6 अंतिम संस्कार होते हैं। वहीं शहर का सबसे व्यस्त श्मशानघाट ग्वारीघाट है, यहां औसतन 6 से 15 अंतिम संस्कार होते हैं। इसके बाद रानीताल, गुप्तेश्वर, चौहानी, शोभापुर और रांझी के श्मशानघाटों का नम्बर आता है।
सरकारी व्यवस्थाओं की कमी-पिछले कुछ सालों के दौरान श्मशानघाटों में व्यवस्थाएं जुटाई गई हैं और भी कक्ष से लेकर शेडों की संख्या तक बढ़ी है, पर उससे भी जरूरी होता है श्मशानघाटों में लकड़ियों को रखने की व्यवस्था करना, पीने के पानी की व्यवस्था करना, बैठने के लिए सुविधाजनक कुर्सियां होना। नगर निगम प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद कई सुविधाएं अभी तक नहीं जुटाई जा सकी हैं।