जबलपुर. हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी के अनुसार बार एसोसिएशनों के आंदोलन के समर्थन में स्टेट बार द्वारा किया गया आह्वान शत-प्रतिशत सफल रहा। उच्च न्यायालय से लेकर तहसील न्यायालयों तक कोई काम नहीं हुआ और बहिष्कार के चलते अदालत परिसरों के गलियारे खाली रहे।
इसी तरह प्रदेश की सभी बार एसोसिएशनों ने चीफ जस्टिस ऑफ इण्डिया को पत्र भेजकर मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की तबादले की एक स्वर में मांग की। मध्यान्ह में हाईकोर्ट बार के सिल्वर जुबली हॉल में राज्य स्तरीय बैठक आयोजित हुई।
बैठक में हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी, सचिव मनीष तिवारी, हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार के अध्यक्ष आरपी अग्रवाल, सचिव विजय शुक्ला, जिला बार के अध्यक्ष अशोक गुप्ता, सचिव मनीष मिश्रा, मप्र स्टेट बार काउंसिल के उपाध्यक्ष मनीष दत्त व अन्य सदस्यों ने सर्वसम्मति से चीफ जस्टिस से मुलाकात का निर्णय लिया।
बैठक में हाईकोर्ट बार के वरिष्ठ उपाध्यक्ष केके पाण्डेय, उपाध्यक्ष शंभूदयाल गुप्ता, सहसचिव गीतेश सिंह ठाकुर, कोषाध्यक्ष संजय सेठ, ग्रंथालय प्रभारी सुरेन्द्र खरे, अधिवक्ता उमेश त्रिपाठी, संजय वर्मा, अमोद गुप्ता, सतीश ठाकुर, अरुण काकोनिया सहित बड़ी संख्या में वकील मौजूद थे।
जूलॉ ने भी दिया समर्थन
हाईकोर्ट बार द्वारा किए जा रहे आंदोलन को मप्र जूनियर लॉयर्स एसोसिएशन ने समर्थन दिया है। एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष प्रशान्त अवस्थी, आशीष त्रिवेदी अध्यक्ष मुकुन्द पाण्डेय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार मंगलवार को कोई भी सदस्य अदालतों में हाजिर नहीं हुए।
स्टेट बार द्वारा बहिष्कार पर बीसीआई को आपत्ति
हाईकोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार बीसीआई के सचिव जेआर शर्मा द्वारा मप्र स्टेट बार के कार्यकारी सचिव मुकेश मिश्रा को एक पत्र भेजा है। पत्र में अविकल कहा गया है कि बार काउंसिल ऑफ इण्डिया के सचिव ने बार काउंसिल के सचिव को संबोधित पत्र में बीसीआई के अध्यक्ष के ई-मेल को उद्धरित करते हुए लिखा है-‘मप्र स्टेट बार काउंसिल द्वारा हाईकोर्ट के कुछ जजों की अदालत के बहिष्कार के आह्वान की जानकारी मुझे मिली है।
मुझे पता चला है कि ऐसा कुछ सदस्यों ने अनावश्यक दवाब डालने के इरादे से ऐसा किया है। यदि कोई वास्तविक मुद्दा है तो वह बार एसोसिएशन की चिन्ता का विषय हो सकता है। मप्र बार काउंसिल न्यायालयों के बहिष्कार के आह्वान के निर्णय पर पुनर्विचार करे और उसे वापस ले। बार काउंसिल द्वारा न्यायालय के बहिष्कार हेतु लिया गया इस प्रकार का कोई कदम संस्था की छवि को दूषित करता है।’