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मुसाफिरों से दूर है जनता खाना, अमीरों के महंगे खाने पर ध्यान देते हैं ठेकेदार

7 वर्ष पहले
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जबलपुर. रेलवे स्टेशनों पर गरीब मुसाफिरों के लिये शुरू किये गये जनता खाने की सेवा न के बराबर ही चल रही है। स्टेशन पर खानपान का कारोबार कर रहे ठेकेदारों को जनता खाने के बदले 125 रुपये में मिलने वाली स्पेशल थाली बेचने में ज्यादा दिलचस्पी रहती है, जबकि ट्रेनों में अमीरों से कहीं ज्यादा गरीब मुसाफिर सफर करते हैं।
यात्रियों के लिये रेलवे ने 15 रुपये में जनता खाना दिये जाने की सेवा शुरू की थी, लेकिन रातोंरात अमीर बनने का सपना संजोए बैठे ठेकेदारों ने गरीबों के जनता खाने को कैन्टीन की कुर्सियों पर नहीं सिर्फ ठेले तक समेट कर रख दिया है।

महज एक औपचारिकता: रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में आर्थिक तंगी के मारे मुसाफिरों के लिये रेलवे ने जनता खाना की सेवा को शुरू किया था। ठेकेदारों ने इस सेवा को भी सफल नहीं होने देने की ठान ली। जनता खाना खाने वाले सर्वाधिक मुसाफिर जनरल कोच के ही होते हैं, लेकिन खानपान का कारोबार करने वाली कंपनी ने अपने नुमाइंदों को साफ कह रखा है कि ठेले पर जनता खाना जनरल कोच के सामने नहीं बेचना है।

क्या है जनता खाना: स्टेशनों पर यात्रियों को 15 रुपये में बेचे जा रहे जनता खाने के पैकेट में सात पुड़ी, आलू जीरा की सब्जी, अचार के साथ एक हरी मिर्च दी जाती है, लेकिन खानपान के व्यवसाय से लगे लोगों को 50 से लेकर 150 रुपये तक का महंगा खाना बेचने पर ज्यादा फायदा नजर आता है।

गायब हो गई जलेबी: आगरा के पेठे और मथुरा के पेड़े की तर्ज पर जबलपुर स्टेशन से भी एक मीठा रखने की तैयारी की गई थी। खोवे की जलेबी बेचने की शुरूआत तो अच्छी थी। सांसद राकेश सिंह के इस प्रयास से लोगों को लगने लगा था कि देश भर में जबलपुर की खोवे की जलेबी का नाम हो जाएगा, लेकिन स्टेशन के कारोबारियों की मेहरबानी से धीरे से जलेबी स्टेशन से गायब हो गई।
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