जबलपुर. एक अहम फैसले में हाईकोर्ट ने कहा है कि जबलपुर नगर निगम में 55 गांवों को शामिल करने के संबंध में की गई आपत्तियों को खारिज करने के लिए महामहिम राज्यपाल को कारण बताना जरूरी नहीं है। इस बारे में जारी की गई अधिसूचना को विधि-सम्मत ठहराते हुए जस्टिस अजित सिंह और जस्टिस एनके गुप्ता की युगलपीठ ने उसे चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।
यह याचिका जबलपुर की ग्राम पंचायत सुहागी के रणजीत सिंह और महाराजपुर निवासी दिनेश पटेल की ओर से दायर की गई थी। आवेदक का कहना था कि नगर निगम में 55 गांवों को शामिल करने के संबंध में पूर्व में जारी अधिसूचना हाईकोर्ट ने निरस्त कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस बारे में दी गई आपत्तियों के निराकरण का अधिकार सिर्फ राज्यपाल को है, इसलिए वे ही इन आपत्तियों का निराकरण करें। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद जबलपुर कलेक्टर ने मामला राज्यपाल के पास भेजा।
इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि धारा 405 में कलेक्टर की भूमिका सिर्फ पोस्टमैन की रहती है, जो प्राप्त आपत्तियों को सिर्फ राज्यपाल को प्रेषित कर सकते हैं। कलेक्टर को यह अधिकार नहीं है कि वे आपत्तियां किसी भी राय या प्रस्ताव के साथ राज्यपाल के पास भेजें। याचिका में यह भी आरोप था कि गांवों को शहर में शामिल करने के संबंध में दी गई आपत्तियों का निराकरण राज्यपाल ने सही ढंग से नहीं किया। और तो और आपत्तियां निरस्त करने के पीछे उन्होंने कोई कारण नहीं बताया। ऐसे में बीते 14 नवम्बर को जारी की गई अधिसूचना विधि-सम्मत न होने के कारण खारिज किए जाने योग्य है। इन आधारों के साथ राज्यपाल द्वारा जारी अधिसूचना खारिज किए जाने की प्रार्थना हाईकोर्ट से की गई थी।
मामले पर शुक्रवार को हुई सुनवाई के बाद युगलपीठ ने धारा 405 का अवलोकन करने के बाद पाया कि इस धारा में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है, जो राज्यपाल को अधिसूचना में आपत्तियों के निराकरण के लिए वजह दर्शाने के लिए बाध्य करता हो। अधिसूचना को विधि-सम्मत पाते हुए युगलपीठ ने याचिका खारिज कर दी।