जबलपुर। मध्यान्ह भोजन जिसे भोजन कतई नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसकी गुणवत्ता में खासी कमी होती है। आलम यह है कि अब तो स्कूलों के बच्चे भोजन खाने से भी कतराने लगे हैं। ठेका खत्म होने के बाद भी नांदी फाउंडेशन की मनमानी बदस्तूर जारी है। सरकारी स्कूलों के अभिभावक रोजाना स्कूलों में जाकर यह शिकायत कर रहे हैं कि मध्यान्ह भोजन खाने के स्थान पर बच्चे घर से टिफिन लेकर स्कूल जा रहे हैं।
करोड़ों की राशि खर्च
मध्यान्ह भोजन में शासन करोड़ों की राशि खर्च कर रहा है। योजना यह सोचकर शुरू की गई थी कि जब भोजन मिलेगा तो अधिक से अधिक बच्चे स्कूलों की दहलीज तक पहुंचेगे। शुरूआत में यह योजना कारगार भी साबित हुई, परंतु अब यह बेअसर हो रही है। सत्र समाप्ति की ओर होता है तो मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता खराब हो जाती है, अभिभावकों की सुनने वाला भी कोई नहीं, इसलिए वे बच्चों को स्कूल भेजने के स्थान पर अपने साथ काम पर ले जाना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं।
आंगनबाडिय़ां भी सूनी
ऐसा नहीं है कि यह केवल स्कूलों की दास्तां है, आंगनबाडिय़ां भी इससे अछूती नहीं हैं। यहां के बच्चे तो उम्र में और कम होते हैं, ऐसे में वे शिकायत भी नहीं कर पाते। आंगनबाड़ी केन्द्रों के अधिकारियों की मानें तो बच्चे पानी वाली दाल खाते ही नहीं हैं। चावल कच्चे और मोटे होते हैं, जिन्हें वे छूते तक नहीं हैं। कई बार शिकायत की, परंतु अब तक कोई हल नहीं िनकल पाया है। रोजाना भोजन जानवरों को डालना पड़ता है।
मिलेगा दूध और अंडा
शासन यह योजना बना रहा है कि अगले सत्र से बच्चों को सप्ताह में एक या दो दिन दूध और अंडा भी दिया जाए। जो बच्चे अंडा नहीं खाएंगे, उन्हें दूध दिया जाएगा और जो अंडा खाएंगे, उन्हें दूध नहीं मिलेगा। ये सारी कवायद इसलिए की जा रही है कि बच्चों को ऐसा आहार दिया जाए, जो उनके विकास के लिए भरपूर साबित हो।
विद्यार्थियों का कहना है
छात्रा - सुनीता कोष्टा उम्र-10 साल
न खाने की वजह - दाल में दाल दिखती ही नहीं है, चावल कच्चा होता है। खाने के बाद पेट में दर्द होता है।
छात्र - मुकेश चड़ार
उम्र-12 साल
न खाने की वजह - रोटी जली और कड़ी होती है उसे खाते ही मुंह कड़वा हो जाता है। फेंकने का मन करता है।
छात्रा - शीला रैकवार
उम्र-11 साल
न खाने की वजह - दाल, सब्जी, रोटी कुछ भी अच्छा नहीं लगता। सप्ताह में दो या तीन बार ही भोजन करती हूं।
छात्र - शैलेश शिकरार
उम्र-13 साल
खाते हैं सिर्फ और सिर्फ कढ़ी और चावल, वह भी कभी-कभी। मिक्स वेज पसंद है, परंतु उसमें मटर ही ज्यादा होता है।
मध्यान्ह भोजन गुणवत्तायुक्त ही मिलना चाहिए। आगामी बैठक में इससे संबंधित मुद्दा भी उठाऊंगा। लोग शिकायत मेरे पास लेकर आएं।
-एसएस ठाकुर, डीईओ
नांदी फाउंडेशन की मनमानी
नांदी फाउंडेशन का ठेका समाप्त हो चुका है, उसके बावजूद उसकी ही मनमानियां जोरों पर चली हैं, एक बार टेन्डर नांदी फाउंडेशन द्वारा अपने सहभागी फाउंडेशन को आगे करने की वजह से कैंसिल हो गया था। सूत्रों ने बताया कि अब भी टेन्डर की प्रक्रिया धीमी चल रही है, उसमें नांदी फाउंडेशन ही सबसे आगे है।
करोड़ों की राशि खर्च
मध्यान्ह भोजन में शासन करोड़ों की राशि खर्च कर रहा है। योजना यह सोचकर शुरू की गई थी कि जब भोजन मिलेगा तो अधिक से अधिक बच्चे स्कूलों की दहलीज तक पहुंचेगे। शुरूआत में यह योजना कारगार भी साबित हुई, परंतु अब यह बेअसर हो रही है। सत्र समाप्ति की ओर होता है तो मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता खराब हो जाती है, अभिभावकों की सुनने वाला भी कोई नहीं, इसलिए वे बच्चों को स्कूल भेजने के स्थान पर अपने साथ काम पर ले जाना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं।
आंगनबाडिय़ां भी सूनी
ऐसा नहीं है कि यह केवल स्कूलों की दास्तां है, आंगनबाडिय़ां भी इससे अछूती नहीं हैं। यहां के बच्चे तो उम्र में और कम होते हैं, ऐसे में वे शिकायत भी नहीं कर पाते। आंगनबाड़ी केन्द्रों के अधिकारियों की मानें तो बच्चे पानी वाली दाल खाते ही नहीं हैं। चावल कच्चे और मोटे होते हैं, जिन्हें वे छूते तक नहीं हैं। कई बार शिकायत की, परंतु अब तक कोई हल नहीं िनकल पाया है। रोजाना भोजन जानवरों को डालना पड़ता है।
मिलेगा दूध और अंडा
शासन यह योजना बना रहा है कि अगले सत्र से बच्चों को सप्ताह में एक या दो दिन दूध और अंडा भी दिया जाए। जो बच्चे अंडा नहीं खाएंगे, उन्हें दूध दिया जाएगा और जो अंडा खाएंगे, उन्हें दूध नहीं मिलेगा। ये सारी कवायद इसलिए की जा रही है कि बच्चों को ऐसा आहार दिया जाए, जो उनके विकास के लिए भरपूर साबित हो।
ये है मीनू
सोमवार मिलता क्या है
वेजिटेबल पुलाव, कढ़ी पकौड़ा कढ़ी, सादा आधा पका हुआ चावल
मंगलवार
पूड़ी-छोले या मटर की रोटी और आलू मटर की सब्जी
सब्जी, खीर या हलवा
बुधवार
जीरा राइस, मिक्स वेज, तुअर दाल पानी वाली दाल, सादा चावल
गुरुवार
रोटी, मंगू या चने की दाल, जली और कड़ी रोटी, सादी
आलू की सब्जी पानी वाली दाल
शुक्रवार
खिचड़ी मूंग दाल, आलू खिचड़ी, आलू की रसेदार सब्जी
मटर एवं टमाटर सब्जी
शनिवार
रोटी ग्रीन मिक्स सब्जी, रोटी, आलू मटर की सब्जी, पानी वाली
मिक्स दाल दाल
कुल मिलाकर देखा जाए तो सप्ताह में बच्चों को रोटियां और पानी वाली दाल ज्यादा बंटती हैं, जिसे वे खाने मजबूर हैं। यही वजह है कि स्कूलों में आने वाला भोजन बच्चे खाने से कतराते हैं।