खंडवा. गरबाें में इस बार परंपरागत और पाश्चात्य शैली का रंग दिखाई दे रहा है। शहर में नाममात्र जगहों पर ही परंपरागत गरबे किए जा रहे हैं पाश्चात्य शैली में गरबा करने वालों की भी कमी नहीं है। जिन स्थानों पर सालों से पारंपरिक गरबे होते थे वहां अब ढोलक माइक की जगह आर्केस्ट्रा साउंड सिस्टम ने ले ली है।
आधुनिक दौर में पारंपरिक गरबा दौड़ियो, दरिया, छकड़ी, चौकड़ी, एक ताल, दो ताल तीन ताली थीम पर किया जा रहा है। गरबा प्रशिक्षक अंशुल वर्मा, गंुजा उपाध्याय, रवि गुप्ता ने बताया आधुनिकता के चलते परंपरागत गरबा के साथ ही लड़कियां पाश्चात्य नृत्य भी कर रही हैं। परिधान भी पाश्चात्य और परंपरागत हो गया है।
वर्तमान दौर में लोगों को आम दिनों में नृत्य का समय नहीं मिलता। बालिकाएं और युवतियां परंपरागत नृत्य सीख भी नहीं पाती। उनके पास परिधान भी पाश्चात्य ही है। ऐसे में नवरात्रि के समय जब गरबों का दौर शुरू होता है तो उन्हें जैसा नृत्य आता है वही करती है। पाश्चात्य और परंपरा के इस फ्यूजन की तैयारी में उन्हें ज्यादा वक्त भी नहीं लगता।
इसलिए दिखाई दे रही दोनों संस्कृति
खंडवा. कालीकाली अमावस की रात में.... काली निकली भैरव के साथ में... मां नवचंडी मंदिर परिसर में बालिकाओं ने परंपरागत वेशभूषा में जब इस गीत पर गरबा किया; माता की भक्ति का उजाला चारों ओर फैल गया। शनिवार रात गरबा पंडाल लोगों की भीड़ से खचाखच भरा रहा। मंदिर और आसपास के क्षेत्र की बालिकाओं ने गरबा गीतों पर मनमोहक प्रस्तुतियां दी। महंत बाबा गंगाराम ने बताया 29 सितंबर को रात 8 बजे पंच मशाल ज्योत काकड़ा आरती की जाएगी। 2 अक्टूबर को अष्टमी की पूजा होगी। 3 को सुबह हवन, रात 9 बजे में जवारों का विसर्जन होगा। दशहरा उत्सव 4 अक्टूबर को मनाया जाएगा।