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‘मैं’ की वास्तविकता को समझना ज्ञान मार्ग का सार
मैंकी वास्तविकता को समझना ज्ञान मार्ग का सार है। किसी भी कार्य को करने में जब तक मैं लगा रहेगा तब तक सफलता नहीं मिलेगी। यह बात गीता ज्ञान कथा के दौरान मंगलवार को विट्ठल मंदिर में संत अखंडानंद जी ने कही। उन्होंने कहा मैं ही वह चेतन है जिसको ब्रह्म कहते हैं। जैसे चुंबक किसी भी चीज को अपनी परिधि के अंदर तक ही खिचता है।
अगर वस्तु में जंग लगा होगा तो वह आकर्षित हनी करेगा। उसी प्रकार मैं है। व्यक्ति के साथ जब तक मैं लगा रहेगा तब तक उसको भक्ति का मार्ग हनी मिलेगा। ज्ञान का मार्ग सर्वोपरि है। भक्ति संयुक्त ज्ञान गीता का मूल सिद्धांत है। मनुष्य की सबसे बडी इच्छा है जिंदा रहना। आत्मा कभी मर हनी सकती। आत्मा से परमात्मा का मिलन होता है। ऐसा ही मनुष्य के पास आत्मा नाम का एक चुबंक है। अंतःकरण है। जो मैं का रूप है।