‘ज्ञानी सदैव स्वदोष दर्शन करता है’
‘ज्ञानी सदैव स्वदोष दर्शन करता है’
बदनावर| ज्ञानीसदैव स्वदोष दर्शन करता है। अपने अवगुणों को दूर करने में प्रय|शील रहता है, लेकिन अज्ञानी परदोष दर्शन कर निंदा में लगा रहता है। धन, वैभव के प्रदर्शन से आत्मगुणों का घात होता है। यह बात बुधवार को जैन स्थानक भवन में प्रवर्तक प्रकाशमुनि ने कही। कहा कि जिस प्रकार दर्पण में हम देह को देखते हैं लेकिन शरीर को स्वच्छ एवं व्यवस्थित तो स्वयं ही करना पड़ता है। इसी प्रकार ज्ञानी पुरुष आत्मदर्शन कर क्षमा, मैत्री, शील, संतोष आदि गुणों की अभिवृद्धि करते है। संत प्रमोदमुनि ने कहा कि सांसारिक सुख पुण्यवानी से मिलता है। व्यक्ति को अन्न, पानी, वस्त्र, औषध आदि दान का पालन करना चाहिए इससे दान देने वाले एवं ग्रहण करने वाले दोनों प्रसन्न रहते हैं।