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नियति से भाजपा का साक्षात्कार

6 वर्ष पहले
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लेखकइस समय एडिनबरा यूनिवर्सिटी, यूके में फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट हैं। उनकी स्कूलिंग संस्कार वैली, भोपाल में हुई है।

आपचाहे जो कहें, लेकिन जब ब्रिटिश शासन के अंत को रेखांकित करते हुए नेहरूजी ने ‘नियति से साक्षात्कार’ की घोषणा की थी, उसके बाद से यह भारतीय लोकतंत्र और चुनावी इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। किसने सोचा था कि यह व्यक्ति, जिसकी वक्तृत्व कला मोदी जैसी नहीं है, जो किसी आम आदमी के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं था वह भाजपा के जगन्नाथी रथ को चुनौती देगा और चुनावी इतिहास का सबसे घातक प्रहार करेगा।

अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को ऐसा बहुत कुछ दिया है, जो उनकी रातों की नींद उड़ा सकता है और जिस पर उन्हें बहुत सोचना पड़ेगा। इसका दूसरा पहलू यह है कि हो सकता है प्रधानमंत्री ने अपने व्यक्तिगत करिश्मे पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया और उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि देश में बने वातावरण को बदलने में बहुत कमजोर साबित हुई। मुझे उम्मीद है कि इस धक्के ने उन्हें जगा दिया है और हनीमून खत्म हो चुका है। लोगों ने बता दिया है कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में सत्ता विरोध का जो दंश झेला, वह इस बार भाजपा को परेशान करने गया है, लेकिन इसमें सिर्फ आठ माह लगे।

किरण बेदी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। उन्होंने अपना राजनीतिक कॅरिअर शुरू करने के लिए सबसे आसान सीट चुनी थी और उन्हें क्या जवाब मिला है? कृष्णा नगर के लोगों को बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने किसी दल के गढ़ होने की परिपाटी को ध्वस्त कर दिया है। यह इस तथ्य का अनूठा उदाहरण है कि लोगों को कम करके आकने का नतीजा क्या होता है। मैंने पढ़ा है कि बसपा, अकाली दल जैसे क्षेत्रीय सांप्रदायिक खिलािड़यों की भी वोटों में हिस्सेदारी 1 फीसदी तक सिमट गई है। इसने बता दिया है कि लोगों ने ऊंचाई का नया मानक हासिल किया है और अब जबकि ‘आप’ ने अपने पंख फैलाए हैं और लोगों को नया विकल्प दिया है, तो सांप्रदायिक विभाजनकारी राजनीति पराजित होगी। ऐसा लगता है कि दिल्ली में तो कांग्रेस ने अपनी अंतिम सांस ले ली है और उसकी मौजूदगी को केजरीवाल ने इतना खारिज कर दिया है कि वह अप्रांसगिकता की निम्नतम गहराई में दफना दी गई है। आखिर दिल्ली के लिए अच्छे दिन ही गए और मैं कहीं पढ़ रहा था कि अब भाजपा के विधायक एक ऑटो रिक्शा में सवार होकर विधानसभा पहुंच सकते हैं। ‘आप’ के पास अब हर मुद्‌दे पर पूरी स्वायत्तता है और केजरीवाल जिस भी दिशा में चाहें, अपनी छड़ी घूमा सकते हैं। अब असली चुनौती है। अब उन्हें इतनी आजादी है कि वे किसी भी मुद्‌दे पर विचार-विमर्श कर बिना देर लगाए उस पर फैसला दे सकते हैं और शेष समय में कुमार विश्वास अपनी कविताएं सुना सकते हैं।

निष्कर्ष यही है कि नरेंद्र मोदी ने एक वक्त उन्हें वानर बताकर जंगल में लौट जाने को कहा था। किरण बेदी ने तो उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया कि जिसके बारे में चर्चा करने की भी जरूरत नहीं है। भाजपा ने उन पर मानहानि का दावा लगाने की बहुत कोशिश की पर केजरीवाल का सितारा बुलंद होता चला गया। वे एक बार गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे पर मिल नहीं सके थे। अब वे उच्च पदाधिकारी की हैसियत से प्रधानमंत्री से मिलकर आए हैं। घटनाक्रम ने क्या अनूठा रूप लिया है! भारतीय राजनीति में एक नई सुबह हुई है।