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कार्पोरेट्स को दिया जा रहा नर्मदा जल व जमीन

5 वर्ष पहले
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14 साल के बाद मिला जमीन के बदले जमीन का हक, अधिकार की लड़ाई में गंवाए पति व दो बेटे
इधर, सरदार सरोवर परियोजना के डूब प्रभावित परिवार को मिली 20 एकड़ जमीन
सरकार कार्पोरेट्स को नर्मदा का पानी व कृषि भूमि देकर राज्य की तिजोरी भर रही है। राजनेता नर्मदा का पानी, अतिउपजाऊ जमीन, नदी-घाटी कार्पोरेट्स की ओर मोड़ने का एक भी मौका छोड़ना नहीं चाहते। राजनेताओं व पूंजीपतियों के गठजोड़ से खेती-किसानी व खेतीहरों की जिंदगी बर्बाद हो रही है। नर्मदा घाटी की संस्कृति व प्रकृति दोनों का अस्तित्व संकट में है। प्रश्न यह है कि इसे बचाने का प्रयास कौन करेगा? नर्मदा पुराण में नर्मदा का जो चित्र बताया है, क्या वह आज भी कायम है? जवाब है, नहीं। सदियों पुरानी दुनिया की सबसे आदिम नदी नर्मदा का संरक्षण व प्रदूषण से मुक्ति जरूरी है।

राजघाट पर भागवत कथा सुनने आए लोगों से नबआं प्रमुख मेधा पाटकर ने यह बात कही। रविवार को नर्मदा जयंती के मौके पर उन्होंने मां नर्मदा को 801 मीटर लंबी चुनरी ओढ़ाई। उन्होंने कहा- नर्मदा घाटी की समृद्धि हस्तांतरित करने में सरकार ने 30 बड़े बांधों को माध्यम बनाया है। प्रत्येक बांध के लाखों विस्थापित ने वर्षों के संघर्ष में पुनर्वास का हक पाया है। बावजूद जमीन के साथ पुनर्वास का अधिकार सरदार सरोवर के 14000 परिवारों को ही मिला है। 48000 परिवारों को अब तक हक नहीं मिला है। सरकार न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने के साथ संवैधानिक जीवन जीने के अधिकार का भी हनन कर रही है। नर्मदा जयंती के मौके पर क्या आपको वर्तमान परिस्थितियां चुभती नहीं है। मन कचोटता नहीं है कि नर्मदा का पानी दूषित हो रहा है। गुजरात की कंपनियों को नर्मदा जल का लाभ मिल रहा है। जबकि मप्र, महाराष्ट्र को नर्मदा की एक बूंद का भी हक नहीं मिला है। हमें सिंचाई के लिए परेशान होना पड़ रहा है। स्थानीय राजनीतिक दल के सदस्य व नागरिक भी दखल देना उचित नहीं समझते। ओंकारेश्वर परियोजना का पानी नर्मदा-क्षिप्रा व नर्मदा-गंभीर पाइप लाइन से बड़ी मात्रा में योजना से विपरीत दिशा में ले जा रहे हैं। अडानी थर्मल पॉवर व एनटीपीसी थर्मल पॉवर जैसी परियोजना से खरगोन, खंडवा में नहरों के इर्द-गिर्द पानी व जमीन दोनों संसाधन दान-धर्म करने की हिम्मत प्रदेश सरकार कर रही है। मुआवजा दिए बगैर भूमिगत पाइप लाइन से किसानों की जमीन बर्बाद की जा रही है।

कथा स्थल पर संबोधित करती मेधा पाटकर।

सुकीबाई से चर्चा करती नबआं नेत्री मेधा पाटकर।

14 साल से मेरा परिवार अपने हक जमीन के बदले जमीन के लिए लड़ रहा था। यह किसी वनवास से कम नहीं है। ऐसा लग रहा है, जैसे भगवान श्रीराम की तरह हमारा भी वनवास खत्म हुआ हो। अब धार जिले में 20 एकड़ जमीन मिली है। कई बार अफसरों ने रुपए की लालच दी। जमीन न मिलने का कारण बताया। परिवार के पालन-पोषण में आर्थिक तंगी सहन की। करीब 8 बार कोर्ट के चक्कर लगाए। हमारी जिद तो सिर्फ जमीन लेने की थी, जो आज हमें मिली है। 14 साल लंबी इस लड़ाई में पति सहित दो बेटे खोना पड़े। कई बार हिम्मत हारने का डर बना, फिर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर व सदस्यों ने सहारा देकर हिम्मत बढ़ाई। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई में साथ खड़े रहे।

जमीन मिलने के बाद कुकरा (राजघाट) निवासी सुकीबाई पति गणपत ने यह बात कही। बहू अनीताबाई पति मोहन केवट ने बताया वर्ष 2002 में घर, जमीन सरदार सरोवर बांध परियोजना के डूब में चला गया। इसके एवज में गणपत पिता गोपाल व दो बेटे मोहन व बाबूलाल को व्यस्क पुत्र होने के नाते विस्थापित होने से पुनर्वास संबंधी लाभ मिलने का अधिकार था, जो नहीं नहीं मिला। 2008 में कोर्ट में करीब 5.30 लाख रुपए का चेक देने का आरोप अफसरों ने लगाए थे। जिसे वह साबित नहीं कर सके। कोर्ट में लड़ाई लड़ते हुए अब हमें हमारा हक मिला है। धार जिले के बालोदा गांव में 20 एकड़ जमीन मिली है। वहां पूरा परिवार एक साथ रहेगा। इस दौरान सुकीबाई के पति गणपत व दोनों बेटे मोहन व बाबूलाल की मौत हो गई। राजघाट पर ही नारियल व प्रसाद की छोटी सी दुकान के सहारे परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।

41 परिवारों को मिला हक
नबआं कार्यकर्ता राहुल यादव व भागीरथ धनगर ने बताया 2002 से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे परिवारों को जीआरए (शिकायत निवारण प्राधिकरण) से जमीन के बदले जमीन मिली है। इसमें बड़वानी जिले के 16, आलीराजपुर के 10 व धार जिले के 15 परिवार को 180 एकड़ जमीन व 36 प्लाट देने के आदेश दिए गए है। इन सभी को तीन महीने में जमीन पावती सहित दी जाएगी।

पर्यटन योजना निजी हाथों में सौंपना गलत
मेधा पाटकर ने पिछले दिनों हनुवंतिया में क्रूज पर हुई मंत्री परिषद की बैठक पर भी आपत्ति ली। उन्होंने कहा- नदी में तैरती मंत्री परिषद की बैठक में पर्यटन योजना को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय लिया गया। नर्मदा में पर्यटन योजना पूरी तरह निजी हाथों में सौंपना राज्य, जनता व नदी के हित में नहीं है। केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा- उपज के सही दाम नहीं देने, घाटे का सौदा बनाकर बेचने के लिए मजबूर करने वाली सरकार घाटी, राज्य या देश की अन्न सुरक्षा के बारे में भी सोचें, अन्यथा भविष्य में अन्न भी विदेश से बुलाना पड़ेगा। मेक इन इंडिया का ढिंढोरा पीटते हुए कौन करेगा निर्माण भारत में और किन चीजों का निर्माण होगा, किस तकनीक से होगा, इससे लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी। उन्होंने अवैध रेत खनन, खनिज विभाग द्वारा चेक पोस्ट नहीं लगाने सहित खनन पर रोक लगाने में अफसरों की नाकामी पर भी रोष जताया।

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