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अिभभावकों को समझना चाहिए बाल पत्रिकाओं का महत्व

7 वर्ष पहले
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वर्तमानमें बाल साहित्य के लिए सकारात्मक माहौल है। पूरे देश में प्रतिवर्ष 70 हजार बाल साहित्य छपता है। करीब 40 बाल पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही है, लेकिन चिंतनीय विषय यह है कि आज अभिभावक इसके महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। स्कूल कोर्स, कोचिंग, समयाभाव का बहाना बनाकर वह बच्चों को ज्ञानवर्धक जानकारियां कोर्स की किताबों के मुकाबले बाल साहित्यों में अधिक मिलती है। इतना ही नहीं बाल साहित्य चरित्र निर्माण में भी महती भूमिका निभाता है। यह बात समकालीन बाल साहित्य के संपादक परशुराम शुक्ल भोपाल ने हिंदी साहित्य में बाल साहित्य विकास संभावनाएं और चुनौतियां विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के शुभारंभ अवसर पर बतौर विशेष अतिथि के कही।

जवाहर लाल नेहरू महाविद्यालय में गुरुवार को आयोजित संगोष्ठी में सुमित्रा वास्केल खरगोन ने कहा बाल साहित्य के प्रति रुझान जरूरी है। यह सिर्फ बच्चों के चरित्र के निर्माण करता है, बल्कि सशक्त राष्ट्र का निर्माण करता है। पहले दिन पधारे विद्वान अतिथि साहित्यकारों और विषय विशेषज्ञों ने संबंधित विषय पर अपने बहुमूल्य विचार रखे। बारिश होने के बावजूद करीब 100 से अधिक शोधार्थी और विद्यार्थियों ने पहले दिन की संगोष्ठी को ध्यानपूर्वक सुना।

यह बोले शोधार्थी विषय विशेषज्ञ

> प्रेमलता तिवारी ने कहा बच्चों में स्वाध्यायी प्रवृति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। अब वह केवल कोर्स की किताबों तक सीमित हैं। इसमें दोष हम जैसे पालकों का ही है। बिना टीवी देखे बच्चे खाना नहीं खाते। अभिभावकों ने उन्हें टीवी, इंटरनेट के बजाय बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि उन्हें पढ़ने के प्रति रूचि जागृत हो गई तो वे शैक्षणिक विषयों को भी उतनी ही रूचि के साथ पढ़ेंगे।

> प्राचार्य डॉ. डीके गुप्ता ने कहा वर्तमान में बाल साहित्य को डिजिटल मीडिया से चुनौतियां मिल रही है। बच्चों का रुझान टीवी, इंटरनेट, मोबाइल, वीडियोगेम की तरफ ज्यादा बढ़ा है।

> डॉ. विकास दवे ने कहा बाल साहित्य उपेक्षित रहा है। बाल साहित्य को सहज एवं सरल होना चाहिए। बच्चा मिट्टी के लांदे के समान है जिसे चाहे जैसा आकार हम बाल साहित्य के माध्यम से दे सकते हैं।

संगोष्ठी कार्यक्रम में यह हुआ

सुबह11 बजे संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि प्रख्यात बाल साहित्यकार श्रीकृष्ण शलभ सारंगपुर उप्र, विशेष अतिथि व