लोक पर्व पर गूंज रहे संझा गीत
संझामाता जीम ले, चुट ले मैं जिमाऊं सारी-सारी रात, चटक चांदनी की रात... , एक फूल घटी गयो संझा माता रुठी गई..., संझा का सासरिया से हाथी भी आयो घोड़ो भी आयो.. पारंपरिक संझा गीतों की गूंज सुनाई पड़ने लगी है। नगर सहित गांव में बालिकाएं लोक पर्व पर गीत गाते हुए संझा माता का पूजन कर रही है। शाम ढलते ही घर-घर की दीवारों पर उकेरी गई संझा माता की आकृति को आकर्षक फूलों से सजाकर बालिकाएं आस्था के साथ आराधना में जुटी हुई है। पूजन करती बालिका राजेश्वरी योगेश्वरी वर्मा, रानू मंडलोई, हेमलता, सांची, पियू ने बताया 16 दिनी पर्व का पूरे साल इंतजार रहता है। गोबर से सुंदर आकृतियां दीवारों पर सजाकर तैयार की जाती है। प्रतिदिन आरती करने के बाद प्रसादी वितरित की जा रही है। बालिकाएं पूजन करने घर-घर पहुंच रही है। संझा माता को लाड़-दुलार जिमाने- रुठने मनाने के साथ अमावस्या पर विदाई दी जाएगी। भारी मन से कन्याएं विसर्जन करेंगी।
दोगांवा में संझा माता की आराधना करती बालिकाएं।