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श्रीकृष्ण और सुदामा की तरह नि:स्वार्थ हो मित्रता

5 वर्ष पहले
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वर्तमान में मित्रता स्वार्थ में बदल रही है। निस्वार्थ भाव से न कोई किसी की मदद करता है और न किसी से बात करता है। अब हम उन्हीं के पास ज्यादा रहते है जहां वाट्सएप, फेसबुक चलाने के लिए नेटवर्क मिले। मित्रता श्रीकृष्ण-सुदामा की तरह नि:स्वार्थहोना चाहिए। सोमवार को शाहपुर में श्री दशावतार कथा के छटवें दिन स्वार्थ में बदलती मित्रता पर जनार्दन महाराज ने यह वक्तव्य दिया।

उन्होंने कहा श्रीकृष्ण के राजा बनने के बाद पहली बार उनके मित्र मथुरा पहुंचे। सभी नए-नए उपहार ले गए। लेकिन सुदामा गरीब थे। सुदामा फटे कपड़ों की पोटली बनाकर कुछ मुट्‌ठी चावल ले गए। जब श्रीकृष्ण को पता चला सुदामा आए है तो तुरंत दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। श्रीकृष्ण ने पूछा क्या लाए हो मेरे लिए। सुदामा ने कहा मेरे पास कुछ नहीं है। श्रीकृष्ण बोले मेरा मित्र मिलने आए और कुछ न लाए ऐसा नहीं हो सकता। फटी पोटली से चावल के दाने गिरते देख श्रीकृष्ण व्याकुल हुए। उन्होंने पोटली लेकर चावल के कुछ दाने भी सम्मान से ग्रहण किए। ऐसी मित्रता हमें भी रखनी चाहिए। सत्संग में कई बार श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का महत्व समझा होगा। लेकिन इसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें। उन्होंने कहा कि आजकल मित्र के दुख-सुख का पता नहीं होगा लेकिन दिनभर में कितनी देर इंटरनेट चलाया इसकी जानकारी पूरी होगी। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

कथावाचक पंडित जनार्दन महाराज

धर्म-कर्म
श्रीदशावतार कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

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